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सरकार से क्यों नाराज हैं किसान-मजदूर?


बुधवार को दिल्ली ऐतिहासिक प्रदर्शन का गवाह बनी। देश भर से बड़ी भारी तादाद में मजदूर और किसानों ने सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक किसानों की इस रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जमकर नारेबाजी हुई। दिल्ली की सड़कें लाल झंडे और किसानों-मज़दूरों से पट गई थीं। अखिल भारतीय किसान सभा, सीटू और खेत मज़दूर संगठन के नेतृत्व में लाखों किसानों और मज़दूरों ने केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ अपनी एकजुटता दिखाई। चुनावी साल में यह एकजुटता मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकती है।

किसान और मजदूर जिन मुद्दों का लेकर संसद मार्च निकालने जुटे उनमें C2 लागत के आधार पर फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना, सभी किसानों को पूर्ण कर्ज माफी, बुर्जुग किसानों के लिए 5 हज़ार रुपए मासिक पेंशन के साथ-साथ सभी वर्ग के कर्मचारियों के लिए 18000 रुपए न्यूनतम वेतन और श्रम क़ानून में बदलाव जैसी 15 सूत्रीय मांगें शामिल हैं।

एआआईकेएस के महासचिव हन्नान मोल्ला ने कहा, “मोदी सरकार ने किसानों से किए अपने वादे पूरे नहीं किए। बीते 4 सालों में किसानों और मज़दूरों के लिए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। ये रैली उसी गुस्से का नतीजा है। किसानों और मज़दूरों का ये गुस्सा 2019 के चुनावों में भाजपा पर भारी पड़ेगा।” इस रैली के बाद नवंबर के आखिरी में भी देश भर किसान दिल्ली कूच करेंगे। तब मुंबई की तर्ज पर किसान लॉन्ग मार्च निकालने की योजना है।

बुधवार की किसान-मजदूर संघर्ष रैली में बड़ी संख्या में शिक्षक, महिला और छात्र संगठन भी शामिल हुए और अपनी आवाज़ बुलंद की। विरोध-प्रदर्शन में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता और वैज्ञानिक गौहर रज़ा ने कहा, “अब देश किसान और मज़दूरों के शोषण को और ज्यादा बर्दास्त नहीं करेगा। जनता किसानों के साथ खड़ी हो गई है।”

देश के कोने-कोने से रैली में शामिल होने आए किसान और मज़दूरों ने अपनी परेशानी भी बयान की। चाहे मज़दूर तबका हो या किसान सभी बढ़ती महंगाई, आमदनी के कम होने मौकों, रोटी-रोटी पर नोटबंदी जैसी मार से नाराज दिखे।