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पेट्रोनेट और टेल्यूरिन के बीच सौदा सवालों के घेरे में


भारतीय पेट्रोनेट और अमेरिकी एलएनजी कंपनी टेल्यूरिन के बीच 17,668 करोड़ रुपये का सौदा होने के सप्ताह भर बाद इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं.

अंग्रेजी अखबार द हिंदू के अनुसार 21 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थति में जो सौदा हुआ, वो असल में सौदा ना होकर सिर्फ दूसरा समझौता ज्ञापन था. असल में 14 फरवरी को पेट्रोनेट और टेल्यूरिन के बीच 18 प्रतिशत इक्विटी स्टेक पर पचास लाख टन एलएनजी के एक समझौता ज्ञापन पर पहले ही हस्ताक्षर हो चुके थे.

टेल्यूरिन ने लुसियाना के अपने ड्रिफ्टवुड प्रोजेक्ट के लिए अंतिम निवेश का फैसला लेने और 2019 के पहले भाग में निर्माण शुरू करने का वादा किया था. साथ ही कंपनी नरेंद्र मोदी के दौरे से पहले समझौते को पूरा करने के लिए मोलभाव भी कर रही थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

इस बारे में टेल्यूरिन की ओर से कहा गया कि वर्तमान का समझौता ज्ञापन पहले से ज्यादा विषय केंद्रित था. यह पहले समझौता ज्ञापन से किस तरह अलग था, इस बारे में जानकारी नहीं थी.

इस समझौते की खबर आते ही 23 सितंबर को पेट्रोनेट के स्टॉक्स में सात प्रतिशत का उछाल आया. वहीं यह खबर भी आई थी कि छह महीने पहले पेट्रोनेट इस सौदे के पक्ष में नहीं था.

तब पेट्रोनेट के निदेशक मंडल का मानना था कि गैस काफी मात्रा में उपलब्ध है और ऐसे में इक्विटी निवेश की आवश्यकता नहीं है. साथ ही एलएनजी की गिरती कीमतों को लेकर भी निदेशक मंडल चिंतित था. लेकिन बाद में स्टॉक की कीमतें घटने पर पेट्रोनेट के अधिकारियों ने निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस करके उन्हें टेल्यूरिन के साथ सौदे को लेकर दोबारा आश्वस्त किया.

एक अधिकारी ने बताया, “गैस के दाम बदलते रहते हैं. जो सौदा अभी खराब लग रहा है, वो कीमत बदलने पर अच्छा लगेगा. इसका उल्टा भी होता रहता है.”

वहीं एलएनजी की मांग में कमी को लेकर भी सौदे पर सवाल उठ रहे हैं. यह एलएनजी की गिरती कीमतों से ज्यादा बड़ी समस्या मानी जा रही है.

केपीएमजी इंडिया में ऊर्जा और प्राकृतिक स्रोतों के नेशनल हेड आशीष डे ने कहा, “अगले दो या तीन सालों में भारतीय बाजार में अति-आपूर्ति हो जाएगी. और अभी कीमतें ऐसी हैं कि कोई भी दीर्घकालीन सौदा करना आसान नहीं होगा.”

2011 में एक दूसरे सार्वजनिक उपक्रम गेल ने 20 साल तक अमेरिकी कंपनियों चेनीर एनर्जी और डोमिनियन एनर्जी से प्रति वर्ष 58 लाख टन एलएनजी खरीदने का सौदा किया था. मांग में कमी की वजह से गेल एलएनजी को दूसरे बाजारों में बेच रहा है.