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कश्मीर के सेब किसानों को लुभाने की कोशिश में नेफेड


सरकार ने घाटी में सेबों की खरीदारी का काम निजी हाथों से निकालकर राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नेफेड) को सौंपा है. सेब की पैदावार घाटी में सबसे ज्यादा होती है. जम्मू-कश्मीर में लगभग 18 लाख टन सेब की पैदावार होती है. इससे कश्मीर को सालाना 1,200 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है.

उल्लेखनीय है कि पिछले तीन दशकों से नेफेड ने घाटी से सेब नहीं खरीदा है. नेफेड के एक अधिकारी ने कहा, “हमें कभी सेब खरीदने की जरूरत नहीं हुई क्योंकि यह हमेशा से निजी क्षेत्र के हाथ में था और सरकार ने भी कभी हमें इसमें दखल देने के लिए नहीं कहा.”

बुधवार को श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट शाहिद चौधरी ने ट्वीट कर कहा,”सेब किसानों के लिए रोमांचक खबर. नेफेड तीन किस्मों के सेबों को प्रभावशाली मूल्य पर खरीदने की तैयारी में है. हर एक फल का ज्यादा से ज्यादा कीमत मिलेगा, आय में वृद्धि होगी, वो भी बिना परिवहन झंझट के.”

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और पूरी घाटी में कर्फ्यू लगाने के बाद केंद्र सरकार का यह कदम वहां के लोगों को लुभाने की तरफ एक पहल की तरह माना जा रहा है.

सरकार ने यह कदम उस वक्त उठाया है जब देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है.

भारत में सालाना कुल सेबों का उत्पादन 23 से 24 टन होता है. इसमें हिमाचल प्रदेश के सेब का उत्पादन 4.5 से 5 टन है. उत्तराखंड में 50 हजार से 60 हजार तक सेब का उत्पादन होता है. अनुमान है कि इस साल सेब का कुल उत्पादन 26 लाख टन होगा. ऐसा अच्छी बर्फबारी की वजह से हुआ है. अकेले जम्मू-कश्मीर में ही 20 लाख टन सेब के उत्पादन का अनुमान है.

अखबाद द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीच में नेफेड के एक अधिकारी ने बताया, “हमें आदेश दिया गया है कि हमें जो कुछ भी दिया जाए, उसे खरीद लें. घाटी से करीब 12 लाख टन सेब खरीदने का लक्ष्य है. सेब के लिए कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं है. राज्य सरकार अलग-अलग ग्रेड (ए, बी और सी) और सेब की किस्मों के अनुसार खरीद के मूल्यों को तय करेगी. उम्मीद है कि हम पिछले साल की बाजर मूल्यों की तुलना में 5 फीसदी ज्यादा दाम देंगे. खरीद की कुल लागत 5 हजार करोड़ रुपये तक का आंकलन किया गया है.”

अधिकारी ने कहा, “जम्मू-कश्मीर बागबानी निदेशालय के योजना और विपणन विभाग वास्तविक खरीदारी करेगा. नेफेड का काम केवल सेबों का वितरण करना है. सेबों की खरीदारी 12 सितंबर से शुरू होगी. यह काम चार मंडियों में होगा जिसमें शोपियान, सोपोर, पारिमपोरा (श्रीनगर) और बटांगो (अनंतताग) शामिल हैं. इसके अलावा अगर बेचन के लिए आए किसानों कि संख्या बढ़ेगी तो हम और सेंटर्स बनाएंगे.”

सेब की खेती अभी मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश में हो रही है. लगभग 50 से 60 फीसदी फल शिमला, नारकंडा, सैंज और रोहड़ू में अभी पेड़ पर ही लगे हुए हैं. कश्मीर में सेब को तोड़ने का काम सितंबर के आखिर तक शुरू होगा.

दिल्ली स्थित एक व्यापारी ने कहा, “इससे पहले फलों को तोड़ने का काम शुरू हो सकता है. लेकिन आमतौर पर किसान अपना माल तब तक नहीं लाते हैं जबतक हिमाचल में बिक्री पूरी नहीं हो जाती है. घाटी में अक्तूबर के महीने में सबसे ज्यादा सेब तोड़े जाते हैं जो दिसंबर की शुरुआत तक बाजार में आता रहता है.”

नेफेड के लिए मुख्य चुनौती का काम कम समय में इसके लिए तैयारी करना है. एक अधिकारी ने कहा, “हमने पिछले हफ्ते ही श्रीनगर में अपना दफ्तर खोला है. हमें खरीदारी करने का आदेश मंगलवार को दोपहर देढ़ बजे मिला था. इसकी वजह से हमारे पास किसानों का पंजीकरण करने के लिए कम समय है. इसके अलावा आधार कार्ड और बैंक खाते की जानकारी जमा लेना ताकि पैसे किसानों के खाते में सीधे डाले जा सकें. कायदे देखा जाए तो यह प्रक्रिया पेड़ों में फूल लगने के वक्त से ही शुरू हो जानी चाहिए थी. लेकिन फिलहाल वो विकल्प मौजूद नहीं है.”

नेफेड को आदेश दिया गया है कि दिसंबर के मध्य तक खरीदारी का काम पूरा हो जाना चाहिए. और साथ ही यह भी आदेश है कि किसानों को उनका भुगतान 48 घंटों के अंदर हो जाना चाहिए.

नेफेड की स्थापना 2 अक्टूबर 1958 को हुई थी. नेफेड की स्थापना पूरे देश में कृषि उपज और वन संसाधनों के व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी. नेफेड सरकारी समितियों के माध्यम से खुली नीलामी में विनियमित मंडियों में सीधे किसानों से स्टॉक खरीदताल है जिससे उनकी उपज का बाजार उचित मूल्य दिलाता है और निजी व्यापारियों के हाथों उनके शोषण होने से बचाता है. साथ ही बाजार में जब कीमतें गिरती हैं और बंपर पैदावार होता है तो नेफेड 16 अधिसूचित कृषि जिंसों (दाल, तिलहन, नारियल, कपास) की मूल्य समर्थन योजना के तहत किसानों से सीधे खरीद करता है. नेफेड किसानों को उनके उपज का सही दाम दिलाता है.