"> Why compromise on the purpose of mid day meal?

Debate

मिड डे मील के मकसद से समझौता क्यों?

बच्चों का पोषण स्तर सुधारने और स्कूलों में उनकी हाजिरी बढ़ाने के लिए पूरे देश में मिड डे मील योजना चलाई जा रही है.

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आखिर खेती में कब लौटेगी रौनक?

सितंबर में मानसून बारिश में सुधार होने के बावजूद कृषि विकास दर में कोई सुधार नहीं आया. 2019-20 की दूसरी तिमाही में कृषि विकास दर 2.1 फीसदी, जबकि जीडीपी 4.5 फीसदी यानी छह साल में सबसे कम है.

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कैसे सुधरेगी खेती-किसानी

देश में किसानों और गांवों का हाल किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में किसानों को कैसे फसलों का सही दाम मिले, कैसे अन्नदाताओं की जिंदगी सुधरे, और कैसे अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिल सके, इन्हीं सवालों के साथ देखिए हमारी ये विशेष चर्चा...

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क्यों खाने के खर्च में कटौती कर रहे ग्रामीण?

बीते 40 साल में पहली बार उपभोक्ता व्यय 3.7 फीसदी घट गया है. इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि ग्रामीण इलाकों में लोग अपने खाने के खर्च में कटौती करने को मजबूर हैं.

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पराली के लिए प्रदूषण कितना जिम्मेदार, आखिर क्या है पराली का समाधान

दिवाली के आसपास दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ने लगता है। इसके लिए खेतों में पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन किसानों के सामने मुश्किल है कि अगर पराली को बगैर जलाए हटाया जाए तो खेती की लागत बढ़ जाती है।

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क्या है पराली का समाधान, किसानों पर ही दोष क्यों

दिवाली के आसपास दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ने लगता है। इसको लेकर खेतों में पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है। लेकिन इन सब में किसानों की बात कितनी सुनी जाती है, क्या है इस समस्या का स्थायी समाधान.

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किसानों के लिए घाटे का सौदा ना बन जाए RCEP

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) मुक्त व्यापार समझौते पर बैंकॉक में 4 नवंबर को बड़ा फैसला हो सकता है.

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गांवों के खुले में शौच से मुक्त होने का दावा कितना सही

स्वच्छ भारत मिशन की सरकारी वेबसाइट देश के गावों को 100 फीसदी खुले में शौच से मुक्त यानी ODF बता रही है। लेकिन क्या वाकई गांवों में सभी घरों में शौचालय बन गए हैं

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आयुष्मान योजना के दावों में कितना दम?

गरीबों को बीमारी के इलाज के खर्च से बचाने और बेहतर इलाज दिलाने के लिए लाई गई आयुष्मान भारत योजना को एक साल पूरा हो चुका है.

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विशेष चर्चा - क्या मनरेगा है गांव का बूस्टर डोज!

भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी का सामना कर रही है. इसके जो भी आंकड़े आए हैं उसमें शहरों के मुकाबले गांवों में मांग ज्यादा कमजोर है.

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विशेष चर्चा- क्यों बेचे दूध पानी से भी सस्ता

क्यों बोतलबंद पानी से भी सस्ता बिक रहा है दूध? आखिर पशुपालन से जुड़े किसानों को दूध की सही कीमत क्यों नहीं मिल पा रही है?

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विशेष चर्चा- क्यों बेचे दूध पानी से भी सस्ता

क्यों बोतलबंद पानी से भी सस्ता बिक रहा है दूध?

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बंजर हो रही जमीन की चुनौती

हाल ही में खत्म हुए COP-14 में जमीन के तेजी से desertification यानी बंजर होने का मुद्दा सामने आया।

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गन्ना किसानों का पैकेज कितना मीठा

मोदी सरकार कभी चीनी का बफर स्टॉक बनाने, तो कभी चीनी के निर्यात पर सब्सिडी बढ़ाने का ऐलान कर रही है.

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विशेष चर्चा: गांव से जुड़े हैं मंदी के तार?

आर्थिक मंदी ने ऑटोमोबाइल के बाद टेक्सटाइल और चाय-बिस्किट उद्योग तक को चपेट में ले लिया है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र तो 2016 में नोटबंदी लागू होने के बाद से बेहाल हैं.

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अच्छे दिन को तरसते गांव

मोदी सरकार के पांच साल में ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था बदहाल हुआ है। यूपीए के पांच साल के मुकाबले बेशक मोदी राज में महंगाई काबू में रही लेकिन ग्रामीण इलाकों में मजदूरी महज 0.5 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी।

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एक नज़र किसान मार्च पर

देश के अन्नदाता अपने दर्द और बदहाली की कहानी सुनाने आज दिल्ली दरबार पहुंचे..देश भर के हज़ारों किसानों ने रामलीला मैदान से जंतर-मंतर तक मार्च निकाला.

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क्या किसानों के नाम पर सिर्फ राजनीति हो रही है?

जनसरोकार के कार्यक्रम राजनीति में आज बात अन्नदाता की. आज बात उस किसान की जो साल के 365 दिन मेहनत कर देश का पेट भरता है. सरकार का दावा है कि देश का किसान खुशहाल है |

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9 अगस्त से आगे

9 अगस्त यानी गुरुवार को अखिल भारतीय किसान सभा जेल भरो आंदोलन का आयोजन करेगी। अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा और कुछ दूसरे दलित संगठन किसानों के साथ मिलकर अपनी मांगों को उठाने के लिए अब साझा मंच पर आए हैं।

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संघर्ष का संगम

किसान, दलित और पूर्व सैनिकों के आंदोलन अब एक मंच पर आ रहे हैं। अखिल भारतीय किसान सभा ने 9 अगस्त को भारत बंद की अपील की है। दूसरे किसान संगठन उसे समर्थन देने का एलान पहले ही कह चुके हैं।

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गन्ना किसानों को कितनी राहत?

केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य में 20 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। लेकिन साथ ही बुनियादी रिकवरी रेट में भी आधा फीसदी का इज़ाफ़ा कर दिया है। इस हाल में किसानों को असल में कितना फायदा होगा? इस अहम सवाल पर ये खास डिबेट।

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खेत से संसद तक लड़ाई

किसान संगठनों ने अपने आंदोलन को और तेज़ करने का एलान किया है। अब लड़ाई खेत-खलिहान से संसद तक लड़ी जाएगी। क्या अब किसान संगठन कामयाब होंगे? उनके बीच अब भी पूरी एकजुटता क्यों नहीं है? इन सवालों पर एक ख़ास चर्चा।

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MSP है राम-बाण?

केंद्र सरकार ने हाल में कृषि उपज के लिए MSP बढ़ाने का एलान किया। लेकिन क्या इससे कृषि संकट का हल निकल आएगा? MSP से कितने किसानों को फ़ायदा होता है? क्या यह ग्रामीण संकट दूर करने की राम-बाण दवा है? इन सवालों पर देखिए ये ख़ास डिबेट।

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प्रधानमंत्री ने वादा निभाया?

केंद्र सरकार का दावा है कि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किसानों को लागत से डेढ़ गुना ज्यादा MSP देने का वादा निभा दिया है। कितना सच है ये दावा? आखिर अब भी किसान खुश क्यों नहीं हैं? इन सवालों पर देखिए ये ख़ास डिबेट।

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प्रधानमंत्री के दावे और वादे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते पांच राज्यों के किसान प्रतिनिधियों के साथ बैठक में कई वादे किए। इनमें खरीफ फसलों के लिए लागत से डेढ़ गुना ज्यादा एमएसपी देना और गन्ने के अगले सीजन के लिए लाभकारी मूल्य का समय पर एलान शामिल है।

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किसान कर्ज़ माफ़ी के पेच

क्या किसानों के कर्ज़ माफ़ करने के बारे में एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए? इस बारे में अलग-अलग राज्यों में हुए फ़ैसलों और उनसे उठे सवालों के बीच ये मांग ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने की है। इससे जुड़े मुद्दों पर ये ख़ास डिबेट।

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बढ़ते प्रदूषण के लिए दोषी कौन?

सारे देश में बढ़ रहे प्रदूषण के लिए दोषी कौन है? 2010 से 2014 तक दिल्ली में प्रदूषण की मात्रा में मामूली गिरावट के बाद 2015 से आखिर में इज़ाफ़ा क्यों होने लगा? क्या पर्यावरण रक्षा की सत्ताधारी नेताओं की चिंता महज दिखावा है?

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राजनीति की नई दिशा?

क्या भारत में क्लास और कास्ट पॉलिटिक्स में तालमेल बन रहा है? क्या इससे राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। इस मज़दूर दिवस पर ऐसे संकेत मिले हैं।

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मई दिवस और मज़दूर आंदोलन

क्या मई दिवस अब पहले जितना महत्त्वपूर्ण नहीं रहा? अब पहले जैसी चर्चा क्यों नहीं होती? क्या इसका कारण मज़दूर आंदोलन का कमज़ोर पड़ जाना है?

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MSP बनाम नकद भुगतान

हाल ही में इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस ने एक रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में ये कहा गया कि फ़सल की लागत से डेढ़ गुना ज़्यादा मूल्य देना बाज़ार के हिसाब से सही नहीं होगा।

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‘दलित’ से परहेज़

क्या ‘दलित’ शब्द दलितों के लिए अपमानजनक है? और क्या यह इसे अंग्रेजों ने चलन में लाया? संघ परिवार यही सोचता है। तो अब वह इस शब्द का इस्तेमाल रोकना चाहता है।

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अब और बलात्कार नहीं?

POCSO कानून में बदलाव के बाद क्या बच्चियों से अब बलात्कार रुक जाएंगे ? क्या सख्त सज़ा का प्रावधान जुर्म रोकने में कारगर साबित होता है ?

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बार-बार आंदोलन क्यों?

महाराष्ट्र में किसान संगठनों ने एक जून से नया आंदोलन शुरू करने का एलान किया है। पिछले साल इसी दिन उन्होंने आंदोलन की शुरुआत की थी, जो बाद में कई दूसरे राज्यों में भी फैल गया। उसके बाद देश भर के 190 से ज़्यादा संगठनों ने ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति बनाई। उधर पिछले महीने महाराष्ट्र में अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किसानों ने बहुचर्चित लॉन्ग मार्च निकाला।

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जन-कल्याण पर मार?

क्या केंद्र की बीजेपी सरकार ना खुद मेहनतकश तबकों का भला करना चाहती है, और ना राज्यों को ऐसा करने देना चाहती है? ख़बरों की माने तो केंद्र सरकार संगठित क्षेत्र के 60 लाख अतिरिक्त कर्मियों को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO के दायरे में लाने के अपने इरादे से पीछे हट गई है।

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अब भी अनचाही क्यों बच्चियां?

दुनिया की जानी-मानी स्वास्थ्य पत्रिका ‘लैंसेट ग्लोबल हेल्थ’ ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया है कि लैंगिक भेदभाव के कारण हर साल भारत में 2,39,000 बच्चियों की मौत हो जाती है।

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AMU के मायने

हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की 80 साल पुरानी तस्वीर ने राष्ट्रीय राजनीति में उबाल ला दिया।

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अब लागू होगी न्यूनतम मज़दूरी ?

क्या दिल्ली में अब सचमुच बढ़ी हुई दरों से न्यूनतम मज़दूरी लागू हो जाएगी? क्या इस मामले में सख़्त सज़ा का प्रावधान कारगर होगा? या यह भी एक छलावा है?

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क्या बचेगा लाल किला?

लाल क़िले को बचाने के लिए लोग सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर उतरे?1857 के ग़दर की सालगिरह पर राजघाट से लाल क़िले तक क्यों पैदल चले लोग? क्या वाक़ई बिक गया है लाल क़िला?

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रोज़गार का कैसा हाल?

देश में रोज़गार के मौके बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? सरकार का दावा है कि रोज़गार में काफी इज़ाफ़ा हो रहा है, लेकिन कई रिपोर्टें इसकी उलटी तस्वीर पेश करती हैं।

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ख़तरे में आरटीआई क़ानून?

क्या आरटीआई क़ानून को बेअसर बनाया जा रहा है? क्या मौज़ूदा केंद्र सरकार को आरटीआई क़ानून पसंद नहीं है?

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ख़त्म हो जाएंगी स्थायी नौकरियां?

हाल में सरकार ने औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम-1946 से जुड़े एक नियम को बदल दिया। इसके ज़रिये अब ‘निश्चित अवधि के लिए अनुबंध पर रोजगार’ का प्रावधान किया गया है। यानी कोई कंपनी किसी कर्मचारी को एक तय और सीमित समय के लिए ठेके पर रख सकेगी।

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बेअसर हो जाएगा एससी-एसटी ऐक्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फ़ैसला दिया, जिससे अनुसूचित जाति-जन जाति अत्याचार (निवारण) कानून को लेकर कई अंदेशे पैदा हो गए हैं। कोर्ट ने इस कानून के तहत मामला दर्ज़ करने के पहले उच्चतर अधिकारियों से अनुमति लेने की शर्त लगा दी है।

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किसान बदलेंगे देश की सियासत ?

देश में अभी किसान आंदोलनों का दौर है। सरकार और राजनीतिक दलों पर इससे दबाव बना है। उनमें खुद को किसानों का हितैषी दिखाने की होड़ लगी हुई है।

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गन्ना किसानों की मुसीबत: दोषी कौन?

एक बार फिर चीनी कारखानों पर गन्ना किसानों का बकाया बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि राज्य में बीजेपी सरकार बनी तो गन्ना किसानों को इस समस्या से मुक्ति दिला दी जाएगी। मगर ऐसा हुआ नहीं है।

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बैंकिंग का संकटः निजीकरण है समाधान?

देश का बैंकिंग सेक्टर गहरे संकट में है। डूबते कर्ज (NPA) ने पहले ही उनकी हालत खराब कर रखी थी। अब ऊपर से रोज बेनकाब होते नए-नए घोटालों ने देश की बैंकिंग व्यवस्था के लिए साख का सवाल खड़ा कर दिया है। फिक्की और एसोचैम जैसी उद्योग जगत की संस्थाओं ने इसके मद्देनज़र सरकारी बैंकों के निजीकरण की मांग उठा दी है। क्या ये सही समाधान है? देखते हैं, इस सवाल पर एक ख़ास डिबेट।

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डीबीटी की ज़िद
क्यों? 

सरकार फूड सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के खाते में ट्रांसफर करने की योजना पर आगे बढ़ रही है। इस बारे में झारखंड के नगड़ी ब्लॉक में पिछले अक्टूबर से प्रयोग चल रहा है। लेकिन इसके अनुभव अच्छे नहीं हैं। नतीजतन वहां के जन-संगठनों ने इसके विरोध में पिछले दिनों पदयात्रा शुरू की।

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कोयला खदानों का निजीकरण

सरकार ने हाल में कोयला खदानों की कॉमर्शियल माइनिंग के लिए नीलामी का फैसला किया। इसे 1973 में हुए इन खदानों के राष्ट्रीयकरण को पलटने वाला फैसला माना गया है। क्या सचमुच ऐसा है? इसी मुद्दे पर ये खास बहस।

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आमदनी दोगुनी करने का रोडमैप?

मोदी सरकार ने 2022 तक किसान आमदनी दोगुनी करने का ऐलान किया है। जबकि कार्यकाल अगले साल ख़त्म होना है। ऐसे में किसान नेता और विशेषज्ञ वाजिब सवाल उठा रहे हैं कि इस हवाई घोषणा का आख़िर आधार क्या है ?

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बीजेपी सरकार की
गौ-नीति - Part 1

किसानों के गले की फांस बनी बीजेपी सरकार की गौ नीति, तो गोवंश के लिए भी मुश्किल। जानवरों के खुला घूमने से फ़सलों को खतरा तो सड़क पर बढ़ गए हैं हादसे। बिक्री पर से रोक हटने का भी नहीँ हुआ असर। जानबूझ कर बुलाई गई मुसीबत की आखिर कौन लेगा जिम्मेदारी?

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बीजेपी सरकार की
गौ-नीति - Part 2

किसानों के गले की फांस बनी बीजेपी सरकार की गौ नीति, तो गोवंश के लिए भी मुश्किल। जानवरों के खुला घूमने से फ़सलों को खतरा तो सड़क पर बढ़ गए हैं हादसे। बिक्री पर से रोक हटने का भी नहीँ हुआ असर। जानबूझ कर बुलाई गई मुसीबत की आखिर कौन लेगा जिम्मेदारी?

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इस बजट में किसान कहाँ?

इस बजट में किसान कहाँ ?

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बजट से नाखुश किसान

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में किसानों को खुश करने की कोशिश की लेकिन यह लगता नहीं की वह इसमें कामयाब हुए। किसान संगठन खुश नहीं है और उन्होंने आंदोलन तेज करने का एलान किया है ।

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ग्रामीण संकट के राजनीतिक परिणाम

क्या बीजेपी ग्रामीण आबादी में बढ़ती नाराज़गी से परेशान है? गुजरात के विधानसभा चुनाव और राजस्थान के उपचुनावों में पार्टी को झटके लगे। उसके बाद से किसानों को लुभाने की कोशिश हो रही है।

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घट रही है किसानों की आमदनी, कम हो रही है खेल-खलिहानों की हरियाली

घट रही है किसानों की आमदनी.. कम हो रही है खेल-खलिहानों की हरियाली... क्या मोदी सरकार निभायेगी अपना वादा ? क्या 2022 तक दोगुनी होगी किसानों की आमदनी ?

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गणतंत्र के धूमधड़ाके में कहां खड़ा किसान, देखिए हिंद किसान की पहली डिबेट

गणतंत्र के धूमधड़ाके में कहां खड़ा किसान..देखिए हिंद किसान की पहली डिबेट.

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