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केंद्र के अध्यादेशों के खिलाफ सड़कों पर उतरे किसान

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा.

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

गाँव में कोरोना से लड़ने की क्या हो तैयारी?

MP के हरदा ज़िले के रोल गाँव में क़रीब 30 लोगों की कोरोना से मृत्यु हो गयी, 350 परिवार वाले गाँव के लिए ये दहशत की बात है, ऐसे में क्या त्वरित action लेने की ज़रूरत है ताकि गाँव के बाक़ी लोग सामान्य जीवन जी सकें, डर में ना जी कर वो क्या सतर्कता बरतें, ऐसे में प्रशासन और सरकारी अमले को तुरंत किस तरह के मास्टर प्लानिंग की ज़रूरत है? ये सब जानने के लिए ‘हिंद किसान’ ने बात की, MP के किसान नेता केदार सिरोही से, ये खुद इस मुश्किल वक्त में लोगों से मिले और उनकी सुध ली। सुनिए ये बातचीत।

क्या है ज़रूरी – ज़िंदगी या चुनाव?

29 April 2021, कोरोना की ख़तरनाक जानलेवा लहर के बीच उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के लिए आख़री चरण का मतदान पूरा हुआ, चुनाव में जिनकी duty लगी उनमें से कितने अपनी जान से हाथ धो बैठे, कितनो के परिवार अभी भी डर के माहौल में जी रहे है क्यूँकि काउंटिंग duty अभी बाक़ी है,2 मई को है, अब बात करें जनता की, तो पंचायत चुनाव होने के कारण खबरें आ रही है कि गाँव के गाँव वोट डालने के बाद बीमार पड़ रहे हैं, संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है, ऐसा क्यूँ? गाँव में इस बीमारी से लड़ने के लिए कितनी तैयारी है? कहते हैं ना कि ‘जान है तो जहान है’, फिर कोरोना काल में ये अहम सीख को अमल में लाने में क्यूँ चूक गयी सरकार? मतदान में क्यूँ हिस्सा ले रहे हैं लोग? सुनिए वाराणसी से मज़दूरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे #मनरेगा​ ऐक्टिविस्ट, सुरेश राठौर को जो कि ‘राइट तो फ़ूड कैम्पेन’ के साथ भी जुड़े हुए हैं।

ज़िंदगी या चुनाव- क्या है ज़रूरी?

कोरोना की मौजूदा लहर में हर दिन जिंदगियाँ रेत की तरह फिसल रही हैं, समाज में लोग अपनों को खो रहे हैं या खोने के डर से हर पल सकते में हैं, इन सब के बीच उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कितने ज़रूरी थे, क्या जनता इनका बहिष्कार नहीं कर सकती थी? क्या मजबूरी है?
जब राजनीति और ज़िंदगी के बीच किसी एक को चुनना हो तो वो क्या हो?
राज्य का मुखिया कहता जा रहा hai, सब कुछ ऑक्सिजन की कोई कमी नहीं, टीकों की कमी नहीं और इस सब के बीच लोगों की साँसे हर सेकंड उखड़ रही हैं,
देहात में पंचायत चुनाव कितना जानलेवा साबित हो रहा है, सुनिए उत्तर प्रदेश से किसान नेता , सरदार VM Singh से हिंद किसान की ये ख़ास बातचीत।

किसान क्यूँ कर रहे हैं साइलोज़ का बहिष्कार?

हरियाणा हो या पंजाब, किसान अडानी के Silos में अपनी फसल देने से इंकार कर रहे हैं, हालाँकि Adani Agro Logistics का कहना है की वो अपने साइलोज़ के ज़रिए FCI को केवल फसल रखने की सुरक्षित जगह उपलब्ध करा रहे हैं। हालाँकि किसानों का आरोप है कि मामला इतना भी सहज नहीं है, इसमें काफ़ी पेंच हैं।
उनका कहना है कि निजीकरण की बयार में मौजूदा सरकार खाद्य सुरक्षा को अहमियत नहीं दे रही।
स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाओं के निजीकरण होने का मंजर कोरोना काल में सबकी आँखों के सामने है, अब रोटी के साथ इतना बड़ा जोखिम क्यूँ लिया जा रहा है?
स्टॉरिज की सुविधा के लिए खुद FCI को सशक्त क्यूँ नहीं किया जा रहा?
इन तमाम सवालों पर सुनिए ‘सीधी मगर तीखी बात’ ! हरियाणा टिकरी बॉर्डर से किसान नेता- भूमि बचाओ संघर्ष समिति के डॉ शमशेर सिंह और हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य प्रदीप सदस्य प्रदीप धनखड़ से ‘हिंद किसान’ की ये बातचीत।

हरियाणा में फसल ख़रीदी को लेकर किसानों के अनुभव

हरियाणा में 1 April 2021 से गेहूँ की ख़रीदी शुरू हो गयी है लेकिन किसान मंडी में बारदाने की कमी से लेकर तमाम दूसरी दिक्कतों से एक दो हो रहे हैं, उनका आरोप है कि सरकार ने मंडियों में ज़बरदस्ती बदइंतज़ामी की हुई है और किसानों को अपनी फसल अडानी साइलोज़ में बेचने के लिए कहा जा रहा है। देश भर में लगभग 150 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन के बीच संयुक्त किसान मोर्चा और हरियाणा के नेता ‘खेती बचाओ, कॉर्प्रॉट भगाओ’ के नारे के साथ इन साइलोज़ का भी बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं, कितना जायज़ हैं इनका बहिष्कार, इन हालात में किसान साइलोज़ में फसल बेचना चाह रहे हैं या नहीं, उन्हें किस तरह का भाव मिल रहा है? क्या है आगे की राह, इन सब मुद्दों पर सुनिए ‘हिंद किसान’ की किसान नेता विकल पचार के साथ ये ख़ास बातचीत।

खाद के बढ़े दाम- क्या करें किसान?

किसानों के लिए खेती किसानी के खर्चे बढ़ते ही जा रहे हैं, डीज़ल के बढ़े रेट्स के बाद अब IFFCO और निजी खाद कंपनियों ने खाद के दाम बढ़ा दिए हैं,
इन बढ़े दाम से किसानों को राहत देने के लिए सरकार के सामने क्या उपाय है?
NBS यानि नूट्रीयंट बेस्ड सब्सिडी के ज़रिए राहत का रास्ता अपनाया जा सकता है?
डॉलर के मुक़ाबले कमजोर होते रूपये को देखते हुए आगे भी आयातित कच्चे माल के भाव ऊँचे ही रहने वाले हैं ऐसे में आगे की क्या तस्वीर होगी?
किसानों को इस मुद्दे पर आगे क्या रणनीति अपनानी चाहिए?
सुनिए इन मुद्दों पर खेती मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हरवीर सिंह जी के साथ ‘हिंद किसान’ की ये ख़ास बातचीत।

क्या ‘गाँव बंद’ की रणनीति आएगी काम?

क्या गाँव बंद से गाँव सही मायनों में आत्मनिर्भर हो पाएँगे और गाँव में उपजी फसल, कच्चे माल के अभाव में क्या शहरी जनता को किसानी के मुद्दे बेहतर तरीक़े से समझ आएँगे?
देश भर में किसान आंदोलन को चलते हुए ४ महीने से ज़्यादा का वक्त हो चला है, संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने पाँच राज्यों में विधान सभा चुनाव के बीच सत्ताधारी पार्टी भाजपा के सांसदों और नेताओं पर ‘वोट की चोट’ की रणनीति बनायी तो अब आम जनता को किसानी के मुद्दे पर और ज़्यादा जागरूक करने के लिए सोच विचार कर रहे हैं, आने वाली 11 और 12 April को MP में एक बार फिर किसान महापंचायत होने जा रही है,
इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के किसान नेता केदार शंकर सिरोही ने MSP की लूट और गाँव बंद की रणनीति का खुलासा किया, सुनिए हिंद किसान की ये ख़ास बातचीत।

FCI बचाओ दिवस पर ख़ास!

किसान MSP गारंटी वाली व्यवस्था देने की माँग कर रहे हैं और सरकार PDS यानी पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम के लिए जो गेहूं या चावल की ख़रीदी या procurement कर, #FCI​ फ़ूड कॉर्परेशन ऑफ इंडिया में रखती है उसी को बता रही है कि सरकार फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदती थी, ख़रीदती है और ख़रीदती रहेगी लेकिन बारीकी यहाँ है! समझना ये है कि FCI के ज़रिए PDS के लिए २-३ फसलों की ख़रीद करना और २३ फसलों का तय सरकारी भाव यानि MSP की गारंटी देना दो अलग अलग बातें हैं जिसे लेकर केंद्र सरकार लोगों को कन्फ़्यूज़ कर रही है।
इस मुद्दे पर ASHA – Alliance for Sustainable and Holistic Agriculture से जुड़ी फार्म ऐक्टिविस्ट #kavithakuruganti​ की हिंद किसान से हुई बातचीत का ये अंश सुनिए और अपनी समझ बनाएँ।

किसान आंदोलन: पूरे हुए 4 महीने, क्या हुआ हासिल?

कृषि क़ानूनों का विरोध और MSP की गारंटी की माँग को लेकर देश भर में संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन के 120 दिन पूरे होने पर भारत बंद का आह्वान किया, यानी 26 November 2020 से शुरू हुए आंदोलन को 26 March को पूरे 4 महीने हो गए हैं, अब ये आंदोलन लगभग पूरे देश में फैल चुका है, इस लम्बे और एतिहासिक आंदोलन के क्या मुख्य बिंदु रहे, अभी तक क्या हासिल हुआ और आगे लड़ाई कितनी लम्बी है, MSP की माँग कितनी ज़रूरी है?
इस सब के बीच जगह जगह से किसान नेताओं की गिरफ़्तारी की भी ख़बरें आयीं, लोकतंत्र में ये कैसा पड़ाव, संवाद से कैसा डर?
इस सब पर ‘हिंद किसान’ ने Farm Activist- Kavitha Kuruganthi जो कि ASHA – Alliance for Sustainable and Holistic Agriculture से जुड़ी है और सरकार से इस मुद्दे पर हुई तमाम वार्ताओं में शामिल रहीं, साथ ही उड़ीसा से राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ के प्रदेश अध्यक्ष Sachin Mahapatra से की ये ख़ास बातचीत।

किसान महापंचायत की गूंज, दक्षिण भारत में भी

किसान महापंचायत की गूंज दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में भी सुनाई दी, BKU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत समेत दूसरे किसान नेता कर्नाटक के किसानों को 20, 21 और 22 March को सम्बोधित करने पहुँचे, वहाँ क्या समा था, कर्नाटक में लोगों ने हिंदी भाषा की सीमा को लांघ कर टिकैत के हिंदी भाषा के पीछे छिपे भावों को पढ़ा या नहीं?
क्या देश भर के किसानों के मुद्दे एक ही हैं और उन्हें लेकर वो कितना एकजुट हैं? बैंगलुरु की क्लाइमट ऐक्टिविस्ट दिशा रवि ने किसानों के समर्थन में जो स्टैंड लिया, उस पर कोर्ट से रिहाई के बाद अब लोगों की क्या राय है, इन तमाम मुद्दों पर हिंद किसान ने की बेबाक़ बातचीत – KRRS कर्नाटक राज्य रायत संघ की किसान नेता, Chukki Rajnundaswamy से, सुनिए ये ख़ास बातचीत ।

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से किसानों का फूटा ग़ुस्सा

किसान आंदोलन को लगभग 4 महीने होने को आए, किसान सरकार की बेरुख़ी और उनकी माँग अनसुनी करने को लेकर काफ़ी ख़फ़ा हैं, ‘हिंद किसान’ ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बैठे कुछ किसानों से बातचीत की और समझा कि आख़िर उन्हें सरकार पर विश्वास क्यूँ नहीं?
“१४ महीने में गन्ने का भुगतान नहीं हो रहा फिर भी सरकार कह रही है बहुत अच्छे दिन जा रहे है, इसलिए कांट्रैक्ट खेती पर बिलकुल विश्वास नहीं”।
दूसरे जनाब का कहना है कि खेती उन्नत करें, निजी निवेश से गुरेज़ नहीं लेकिन MSP पर ख़रीद को बाध्यकारी क्यूँ नहीं बना रहे?
“100 Rs पेट्रोल पर महँगाई नहीं बढ़ी, अनाज पर 10 Rs बढ़े तो महँगाई बढ़ गयी और आटा किस भाव बिक रहा है उसका कोई पूछने वाला नहीं है”।
सुनिए पूरी बातचीत।

किसान आंदोलन: राजनीति या आजीविका की लड़ाई?

किसान आंदोलन देश के अलग अलग राज्यों में बढ़ता जा रहा है, जिन ५ राज्यों में चुनाव है वहाँ केंद्र में सत्ताधारी पार्टी BJP पर ‘वोट की चोट’ करने की बात हो रही है, दक्षिण भारत के तमाम राज्यों में उत्तर भारत की तरह महा पंचायतों का दौर शुरू हो गया है, ऐसे में किसानों पर राजनीति करने के आरोप लग रहे हैं, क्या ये आरोप सही हैं या ये फिर उनकी आजीविका की लड़ाई है? सुनिए किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष, चौधरी पुष्पेंद्र सिंह से ये ख़ास बातचीत, तीखी मगर-सीधी बात!

कृषि आंदोलन: क्या है किसानों का मूड?

कृषि आंदोलन को 115 दिन होने को आए, इस बीच ये आंदोलन पंजाब-हरियाणा- उत्तर प्रदेश-राजस्थान-मध्य प्रदेश के बाद अब उन राज्यों में भी पहुँच रहा है जहाँ विधान सभा चुनाव हैं, यहाँ तक की अगले कुछ दिनों में दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक में भी किसान महापंचायतें होने जा रही हैं, संयुक्त किसान मोर्चा की अगुवाई में किसान और उनके समर्थक केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भाजपा को ‘वोट की चोट’ पहुँचाने की बात भी कर रहे हैं, आख़िर लोकतंत्र में क्यूँ आया ये पड़ाव? किसान राजनीति कर रहे हैं या फिर ये उनकी आजीविका की लड़ाई है जो इस मुक़ाम तक आ पहुँची है?
इन तमाम मुद्दों पर सुनिए Green India के Director, इंद्र शेखर की सीधी मगर तीखी बात!
इंद्र शेखर Green India के Director हैं और कृषि-पर्यावरण जैसे मुद्दों पर लेख लिखते हैं, इससे पहले बतौर Director, National Seed Association of India के पद पर भी काम कर चुके हैं। हाल ही में UP, MP, हरियाणा और राजस्थान में हुई तमाम किसान महापंचायतों का हिस्सा रहे इंद्र शेखर से सुनिए उनके ज़मीनी अनुभव ‘हिंद किसान’ की इस ख़ास बातचीत में।

अनाज की ख़रीद को लेकर FCI की सख़्ती क्यूँ?

1 April से रबी मार्केटिंग सीज़न 2021-22 के लिए FCI ने अनाज ख़रीदी के नियमों में सख़्ती करने का प्रस्ताव सामने रखा है, ताकि खाद्यान्न की गुणवत्ता पर ज़ोर हो और उसका सही रख रखाव हो सके। FCI यानी Food Corporation of India ने गेहूँ, धान में नमी की मात्रा को पहले से कम करने के अलावा और भी तमाम specifications जारी की हैं, हाल ही में केंद्र सरकार ने ये अधिमूचना भी जारी की थी कि इस मार्केटिंग सीज़न से पंजाब में FCI उन्हीं किसानों से ख़रीद करेगी जिनकी ज़मीन का record सरकार के पास है, साथ ही पंजाब में सीधा किसानों के बैंक खातों में DBT के ज़रिए फ़सल ख़रीद का पैसा दिया जाएगा ना की आढ़तियों के ज़रिए, इन सब बदलावों को किसान, आढ़ती और कृषि अर्थशास्त्री कैसे देख रहे हैं, क्या इन बदलावों की टाइमिंग सही है, जबकि देश भर के किसान तीन कृषि क़ानून और MSP की माँग को लेकर पहले ही नाराज़ है, परेशान हैं?
इस मुद्दे पर सुनिए हिंद किसान की ये ख़ास चर्चा, हरियाणा- टिकरी बॉर्डर से किसान नेता-विकल पचार, पंजाब से आढ़ती असोसीएशन के अध्यक्ष विजय कालरा और पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला से कृषि अर्थशास्त्री- लखविंदर सिंह के साथ।

‘रोटी को तिजोरी में नहीं बंद होने देंगे’

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर में चल रहे किसान आंदोलन में मंच के पास बैठी महिलाएँ अपनी सेवा का दान देते दिखी और उन्हें ये चिंता भी करते सुना कि ये लड़ाई केवल किसानों की नहीं, आम उपभोक्ता और ख़ासतौर से गरीब वर्ग की रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई है। सुनिए इन महिलाओं की मन की बात, क्यूँ खड़ी हैं ये किसानों के साथ।

सेब बागवानों को भी मिले लाभकारी मूल्य

कृषि आंदोलन के बीच पहाड़ी राज्यों के फल उत्पादकों ने भी MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की माँग को सामने रखा है, किसान-बागवानों ने अपनी साझा लड़ाई लड़ने के लिए संयुक्त किसान मंच गठित किया है, क्या हैं उनकी परेशनियाँ? बड़ी Companies के आने से सेब के कारोबार में क्या बदलाव आए हैं? कृषि क़ानून के तार किसान-बागवानों से कैसे जुड़े हैं, विदेशी सेब के भारत आने से किसान किस तरह के सुरक्षा कवच या मदद की गुहार लगा रहे हैं, इन तमाम मुद्दों पर सुनिए
‘हिंद किसान’ की ये ख़ास बातचीत, हिमाचल प्रदेश के फल, सब्ज़ी और फूल उत्पादक संघ के प्रदेश अध्यक्ष, हरीश चौहान से।

किसान आंदोलन के 100 दिन पार, लोकतंत्र में ये कैसा पड़ाव!

हिंद किसान ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर डटे किसानों से की ‘मन की बात’, किसानों में अभी भी कितना धैर्य, कितना जोश बाक़ी है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में 100 दिन से ज़्यादा चलने वाले इस आंदोलन को किसानों की जीत समझा जाए या ये शर्म की बात है कि प्रजातंत्र में सरकार प्रजा की फ़रियाद अनसुनी कर रही है! बातचीत का कोई ओर छोर नज़र नहीं आ रहा है, कब तक चलेगी सरकार की ये चुप्पी या अनदेखी का दौर और किसानों का विरोध जो अलग अलग राज्यों में तेज़ी से फैल रहा है।

‘महिला दिवस’ पर ग्रामीण-आदिवासी महिलाओं के हक़ की बात

महिला दिवस पर सुनिए ये ख़ास चर्चा – केरल, ओडिशा और पंजाब से जुड़े वो ख़ास लोग जो ग्रामीण भारत की महिलाओं के साथ ज़मीनी चुनौतियों से लड़ रहे है, उनकी ज़िंदगी आसान बनाने में , उन्हें पंख फैलाने में, सम्मान के साथ ज़िंदगी जीने में अदद भूमिका निभा रहे हैं, महिला दिवस पर जानें MSP की क़ानूनी माँग महिला किसान, खेतिहर मज़दूर और आदिवासी महिलाओं के लिए क्यूँ ज़रूरी है।

किसान आंदोलन के 100 दिन: MSP पर कहाँ फँस रहा पेंच?

कृषि क़ानून को रद्द किए जाने और MSP को क़ानूनी जामा पहनाने की माँग को लेकर किसानों के आंदोलन को 5 March 2021 को 100 दिन पूरे हो गए हैं, लेकिन मामला समय के साथ और पेचीदा होता जा रहा है, समाधान की खिड़की कैसे और कब खुलेगी? MSP को लेकर क्या कोई फ़ॉर्म्युला ढूँढना होगा जो किसानों और निजी व्यापारी दोनों को मान्य होगा? इस सब के बीच सरकार की भूमिका क्या होगी? इन्हीं तमाम सम्भावनाओं को लेकर सुनिए हिंद किसान की ख़ास बातचीत, Agri-economist,CACP- Comission for Agriculture Cost and Prices के पूर्व Chairman, Dr Tajamul Haque और किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष, Pushpendra Singh के साथ।

कृषि क़ानून: MP में किसान महापंचायत का दौर चालू

कृषि क़ानून का विरोध और पंचायत और महापंचायतों के ज़रिए उसके विवादित पहलुओं को लोगों तक पहुँचाने की क़वायद का दौर जारी है , इस बीच पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान के बाद ताज़ा फ़ोकस मध्य प्रदेश पर आ गया है जहाँ 4 मार्च से अगले तीन दिनों तक किसान महापंचायतें होंगी, इनका क्या स्वरूप रहेगा?
Congress शासित राज्यों में MSP को क़ानूनी जामा पहनाने को लेकर क्या सोच है?
Congress के मैनिफ़ेस्टो में APMC मंडी सुधार और निजी निवेश को लेकर क्या दूरदर्शिता थी और वो सोच BJP से किस तरह अलग है।
कृषि क़ानून की संवैधानिक वैध्यता को तय करने के मामले में supreme कोर्ट की क्या भूमिका हो, इन सब पर Congress के क़द्दावर नेता, MP के पूर्व मुख्य मंत्री और राज्य सभा सांसद दिग्विजय सिंह से हिंद किसान की ख़ास बातचीत।