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केंद्र के अध्यादेशों के खिलाफ सड़कों पर उतरे किसान

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा.

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसान आंदोलन: पूरे हुए 4 महीने, क्या हुआ हासिल?

कृषि क़ानूनों का विरोध और MSP की गारंटी की माँग को लेकर देश भर में संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन के 120 दिन पूरे होने पर भारत बंद का आह्वान किया, यानी 26 November 2020 से शुरू हुए आंदोलन को 26 March को पूरे 4 महीने हो गए हैं, अब ये आंदोलन लगभग पूरे देश में फैल चुका है, इस लम्बे और एतिहासिक आंदोलन के क्या मुख्य बिंदु रहे, अभी तक क्या हासिल हुआ और आगे लड़ाई कितनी लम्बी है, MSP की माँग कितनी ज़रूरी है?
इस सब के बीच जगह जगह से किसान नेताओं की गिरफ़्तारी की भी ख़बरें आयीं, लोकतंत्र में ये कैसा पड़ाव, संवाद से कैसा डर?
इस सब पर ‘हिंद किसान’ ने Farm Activist- Kavitha Kuruganthi जो कि ASHA – Alliance for Sustainable and Holistic Agriculture से जुड़ी है और सरकार से इस मुद्दे पर हुई तमाम वार्ताओं में शामिल रहीं, साथ ही उड़ीसा से राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ के प्रदेश अध्यक्ष Sachin Mahapatra से की ये ख़ास बातचीत।

किसान महापंचायत की गूंज, दक्षिण भारत में भी

किसान महापंचायत की गूंज दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में भी सुनाई दी, BKU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत समेत दूसरे किसान नेता कर्नाटक के किसानों को 20, 21 और 22 March को सम्बोधित करने पहुँचे, वहाँ क्या समा था, कर्नाटक में लोगों ने हिंदी भाषा की सीमा को लांघ कर टिकैत के हिंदी भाषा के पीछे छिपे भावों को पढ़ा या नहीं?
क्या देश भर के किसानों के मुद्दे एक ही हैं और उन्हें लेकर वो कितना एकजुट हैं? बैंगलुरु की क्लाइमट ऐक्टिविस्ट दिशा रवि ने किसानों के समर्थन में जो स्टैंड लिया, उस पर कोर्ट से रिहाई के बाद अब लोगों की क्या राय है, इन तमाम मुद्दों पर हिंद किसान ने की बेबाक़ बातचीत – KRRS कर्नाटक राज्य रायत संघ की किसान नेता, Chukki Rajnundaswamy से, सुनिए ये ख़ास बातचीत ।

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से किसानों का फूटा ग़ुस्सा

किसान आंदोलन को लगभग 4 महीने होने को आए, किसान सरकार की बेरुख़ी और उनकी माँग अनसुनी करने को लेकर काफ़ी ख़फ़ा हैं, ‘हिंद किसान’ ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बैठे कुछ किसानों से बातचीत की और समझा कि आख़िर उन्हें सरकार पर विश्वास क्यूँ नहीं?
“१४ महीने में गन्ने का भुगतान नहीं हो रहा फिर भी सरकार कह रही है बहुत अच्छे दिन जा रहे है, इसलिए कांट्रैक्ट खेती पर बिलकुल विश्वास नहीं”।
दूसरे जनाब का कहना है कि खेती उन्नत करें, निजी निवेश से गुरेज़ नहीं लेकिन MSP पर ख़रीद को बाध्यकारी क्यूँ नहीं बना रहे?
“100 Rs पेट्रोल पर महँगाई नहीं बढ़ी, अनाज पर 10 Rs बढ़े तो महँगाई बढ़ गयी और आटा किस भाव बिक रहा है उसका कोई पूछने वाला नहीं है”।
सुनिए पूरी बातचीत।

किसान आंदोलन: राजनीति या आजीविका की लड़ाई?

किसान आंदोलन देश के अलग अलग राज्यों में बढ़ता जा रहा है, जिन ५ राज्यों में चुनाव है वहाँ केंद्र में सत्ताधारी पार्टी BJP पर ‘वोट की चोट’ करने की बात हो रही है, दक्षिण भारत के तमाम राज्यों में उत्तर भारत की तरह महा पंचायतों का दौर शुरू हो गया है, ऐसे में किसानों पर राजनीति करने के आरोप लग रहे हैं, क्या ये आरोप सही हैं या ये फिर उनकी आजीविका की लड़ाई है? सुनिए किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष, चौधरी पुष्पेंद्र सिंह से ये ख़ास बातचीत, तीखी मगर-सीधी बात!

कृषि आंदोलन: क्या है किसानों का मूड?

कृषि आंदोलन को 115 दिन होने को आए, इस बीच ये आंदोलन पंजाब-हरियाणा- उत्तर प्रदेश-राजस्थान-मध्य प्रदेश के बाद अब उन राज्यों में भी पहुँच रहा है जहाँ विधान सभा चुनाव हैं, यहाँ तक की अगले कुछ दिनों में दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक में भी किसान महापंचायतें होने जा रही हैं, संयुक्त किसान मोर्चा की अगुवाई में किसान और उनके समर्थक केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भाजपा को ‘वोट की चोट’ पहुँचाने की बात भी कर रहे हैं, आख़िर लोकतंत्र में क्यूँ आया ये पड़ाव? किसान राजनीति कर रहे हैं या फिर ये उनकी आजीविका की लड़ाई है जो इस मुक़ाम तक आ पहुँची है?
इन तमाम मुद्दों पर सुनिए Green India के Director, इंद्र शेखर की सीधी मगर तीखी बात!
इंद्र शेखर Green India के Director हैं और कृषि-पर्यावरण जैसे मुद्दों पर लेख लिखते हैं, इससे पहले बतौर Director, National Seed Association of India के पद पर भी काम कर चुके हैं। हाल ही में UP, MP, हरियाणा और राजस्थान में हुई तमाम किसान महापंचायतों का हिस्सा रहे इंद्र शेखर से सुनिए उनके ज़मीनी अनुभव ‘हिंद किसान’ की इस ख़ास बातचीत में।

अनाज की ख़रीद को लेकर FCI की सख़्ती क्यूँ?

1 April से रबी मार्केटिंग सीज़न 2021-22 के लिए FCI ने अनाज ख़रीदी के नियमों में सख़्ती करने का प्रस्ताव सामने रखा है, ताकि खाद्यान्न की गुणवत्ता पर ज़ोर हो और उसका सही रख रखाव हो सके। FCI यानी Food Corporation of India ने गेहूँ, धान में नमी की मात्रा को पहले से कम करने के अलावा और भी तमाम specifications जारी की हैं, हाल ही में केंद्र सरकार ने ये अधिमूचना भी जारी की थी कि इस मार्केटिंग सीज़न से पंजाब में FCI उन्हीं किसानों से ख़रीद करेगी जिनकी ज़मीन का record सरकार के पास है, साथ ही पंजाब में सीधा किसानों के बैंक खातों में DBT के ज़रिए फ़सल ख़रीद का पैसा दिया जाएगा ना की आढ़तियों के ज़रिए, इन सब बदलावों को किसान, आढ़ती और कृषि अर्थशास्त्री कैसे देख रहे हैं, क्या इन बदलावों की टाइमिंग सही है, जबकि देश भर के किसान तीन कृषि क़ानून और MSP की माँग को लेकर पहले ही नाराज़ है, परेशान हैं?
इस मुद्दे पर सुनिए हिंद किसान की ये ख़ास चर्चा, हरियाणा- टिकरी बॉर्डर से किसान नेता-विकल पचार, पंजाब से आढ़ती असोसीएशन के अध्यक्ष विजय कालरा और पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला से कृषि अर्थशास्त्री- लखविंदर सिंह के साथ।

‘रोटी को तिजोरी में नहीं बंद होने देंगे’

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर में चल रहे किसान आंदोलन में मंच के पास बैठी महिलाएँ अपनी सेवा का दान देते दिखी और उन्हें ये चिंता भी करते सुना कि ये लड़ाई केवल किसानों की नहीं, आम उपभोक्ता और ख़ासतौर से गरीब वर्ग की रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई है। सुनिए इन महिलाओं की मन की बात, क्यूँ खड़ी हैं ये किसानों के साथ।

सेब बागवानों को भी मिले लाभकारी मूल्य

कृषि आंदोलन के बीच पहाड़ी राज्यों के फल उत्पादकों ने भी MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की माँग को सामने रखा है, किसान-बागवानों ने अपनी साझा लड़ाई लड़ने के लिए संयुक्त किसान मंच गठित किया है, क्या हैं उनकी परेशनियाँ? बड़ी Companies के आने से सेब के कारोबार में क्या बदलाव आए हैं? कृषि क़ानून के तार किसान-बागवानों से कैसे जुड़े हैं, विदेशी सेब के भारत आने से किसान किस तरह के सुरक्षा कवच या मदद की गुहार लगा रहे हैं, इन तमाम मुद्दों पर सुनिए
‘हिंद किसान’ की ये ख़ास बातचीत, हिमाचल प्रदेश के फल, सब्ज़ी और फूल उत्पादक संघ के प्रदेश अध्यक्ष, हरीश चौहान से।

किसान आंदोलन के 100 दिन पार, लोकतंत्र में ये कैसा पड़ाव!

हिंद किसान ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर डटे किसानों से की ‘मन की बात’, किसानों में अभी भी कितना धैर्य, कितना जोश बाक़ी है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में 100 दिन से ज़्यादा चलने वाले इस आंदोलन को किसानों की जीत समझा जाए या ये शर्म की बात है कि प्रजातंत्र में सरकार प्रजा की फ़रियाद अनसुनी कर रही है! बातचीत का कोई ओर छोर नज़र नहीं आ रहा है, कब तक चलेगी सरकार की ये चुप्पी या अनदेखी का दौर और किसानों का विरोध जो अलग अलग राज्यों में तेज़ी से फैल रहा है।

‘महिला दिवस’ पर ग्रामीण-आदिवासी महिलाओं के हक़ की बात

महिला दिवस पर सुनिए ये ख़ास चर्चा – केरल, ओडिशा और पंजाब से जुड़े वो ख़ास लोग जो ग्रामीण भारत की महिलाओं के साथ ज़मीनी चुनौतियों से लड़ रहे है, उनकी ज़िंदगी आसान बनाने में , उन्हें पंख फैलाने में, सम्मान के साथ ज़िंदगी जीने में अदद भूमिका निभा रहे हैं, महिला दिवस पर जानें MSP की क़ानूनी माँग महिला किसान, खेतिहर मज़दूर और आदिवासी महिलाओं के लिए क्यूँ ज़रूरी है।

किसान आंदोलन के 100 दिन: MSP पर कहाँ फँस रहा पेंच?

कृषि क़ानून को रद्द किए जाने और MSP को क़ानूनी जामा पहनाने की माँग को लेकर किसानों के आंदोलन को 5 March 2021 को 100 दिन पूरे हो गए हैं, लेकिन मामला समय के साथ और पेचीदा होता जा रहा है, समाधान की खिड़की कैसे और कब खुलेगी? MSP को लेकर क्या कोई फ़ॉर्म्युला ढूँढना होगा जो किसानों और निजी व्यापारी दोनों को मान्य होगा? इस सब के बीच सरकार की भूमिका क्या होगी? इन्हीं तमाम सम्भावनाओं को लेकर सुनिए हिंद किसान की ख़ास बातचीत, Agri-economist,CACP- Comission for Agriculture Cost and Prices के पूर्व Chairman, Dr Tajamul Haque और किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष, Pushpendra Singh के साथ।

कृषि क़ानून: MP में किसान महापंचायत का दौर चालू

कृषि क़ानून का विरोध और पंचायत और महापंचायतों के ज़रिए उसके विवादित पहलुओं को लोगों तक पहुँचाने की क़वायद का दौर जारी है , इस बीच पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान के बाद ताज़ा फ़ोकस मध्य प्रदेश पर आ गया है जहाँ 4 मार्च से अगले तीन दिनों तक किसान महापंचायतें होंगी, इनका क्या स्वरूप रहेगा?
Congress शासित राज्यों में MSP को क़ानूनी जामा पहनाने को लेकर क्या सोच है?
Congress के मैनिफ़ेस्टो में APMC मंडी सुधार और निजी निवेश को लेकर क्या दूरदर्शिता थी और वो सोच BJP से किस तरह अलग है।
कृषि क़ानून की संवैधानिक वैध्यता को तय करने के मामले में supreme कोर्ट की क्या भूमिका हो, इन सब पर Congress के क़द्दावर नेता, MP के पूर्व मुख्य मंत्री और राज्य सभा सांसद दिग्विजय सिंह से हिंद किसान की ख़ास बातचीत।

संविधान के आधार पर जानें: क्या है काला कृषि क़ानून में?

भारत भूमि बचाओ संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश दलाल जो ख़ुद एक किसान हैं और पेशेवर वक़ील हैं, उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स कर इस बात पर रोशनी डाली कि संविधान के मुताबिक़ कृषि क़ानून में क्या काला है, क्या ग़ैर संवैधानिक है। सिलसिलेवार तरीक़े से केंद्र की सूची, राज्य की सूची और समवर्ती सूची में कृषि कारोबार और कृषि से जुड़े पहलुओं पर संविधान ने क्या क्या सुरक्षा कवच प्रदान किया हुआ है, इसी मुद्दे पर सुनिए रमेश दलाल से हिंद किसान की ख़ास बातचीत।

MSP को लेकर WTO का कितना दबाव?

कृषि क़ानून को लेकर देश भर में चल रहे किसान आंदोलन में किसानों की सबसे बड़ी माँग है – MSP को क़ानूनी जामा पहनाना, लेकिन सरकार इसको लिखित में नहीं दे पा रही है, क्या है सरकार की मजबूरी? क्या WTO, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनायज़ेशन का भारतीय सरकार पर कोई दबाव है, क्या है रास्ता, देश की खाद्य सुरक्षा को लेकर क्या है चिन्ताएँ? किसानों को दी जा रही सब्सिडी आख़िर कौन से बॉक्स में आती है, उनका क्या असर पड़ता है, ये सब पेचीदी बातें आसान भाषा में समझें, Agriculture and Trade Expert, अफ़सर जाफ़री साहब से।

‘पगड़ी संभाल दिवस’ पर किसानों के मन की बात

भारत भूमि बचाओ संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश दलाल से हिंद किसान की ख़ास बातचीत।1907 में ब्रिटिश हुकूमत से किसानों की ज़मीन को लेकर तीन क़ानूनों का विरोध करने वाले सरदार अजीत सिंह की 140वीं जयंती पर किसानों ने 23 फ़रवरी को ‘पगड़ी संभाल दिवस’ मनाया और अपने आत्मसम्मान का इज़हार किया, इतिहास के पन्नों में क्या है इस दिन का महत्व, क्या था पगड़ी संभाल जट्टा मूव्मेंट? उसके तार 2020 ke कृषि क़ानून से कैसे जुड़े हैं और खेतिहर ज़मीन को लेकर क्या है किसानों में आशंका, इन सब मुद्दों पर सुनिए रमेश दलाल की सीधी मगर तीखी बात!

आने वाले दिनो में कैसा होगा किसान आंदोलन का स्वरूप?

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह से हिंद किसान की ख़ास बातचीत। कृषि क़ानून के विरोध में किसान आंदोलन को लगभग तीन महीने पूरे हो गए हैं, तीसरा पड़ाव आते आते, रबी की कटाई भी सिर पर है, ऐसे में किसानों का आंदोलन आगे ढीला होगा या और तीखा?
किसानों की ‘वोट की चोट’ की स्ट्रैटेजी कितना असर लाएगी? सुनिए…

क्या है MNREGA से जुड़े factual डिटेल्ज़?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने १२ फ़रवरी को राज्यसभा में बजट पर जवाब देते हुए मनरेगा के बजट में की गयी कटौती पर कड़ा रूख अपनाया, उन्होंने जानकारी दी कि मनरेगा के तहत आवंटित कोष का इस्तेमाल उनकी सरकार में बढ़ा है और अपने तर्क के सपोर्ट में उन्होंने 2009-10 से लेकर अभी तक के इससे जुड़े आँकड़े भी पेश किए, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर ‘ Less emotional, more factual debate’ होनी चाहिए। इसी मुद्दे पर हिंद किसान ने factual बातचीत की मनरेगा के ज़मीनी कार्यकर्ता से, सुनिए उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मनरेगा मज़दूर union के संयोजक, Suresh Rathore का क्या कहना है?

‘अन्नदाता का इमोशनल कार्ड ना खेलें’ क्या है इसका सीधा जवाब!

कृषि नीति एक्स्पर्ट #DevinderSharma​ से ख़ास बातचीत, ज़रूर सुनें और समझ बनाएँ। ‘अन्नदाता का इमोशनल कार्ड मत खेलिए’ किसान फसल उगाता है उसे बेचता है, कमाई करता है। ‘पंजाब के किसानों को देखिए सब अमीर हैं, बड़े बड़े घरों से हैं, बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं’ उन मिडल्मेन की कमाई पर असर पड़ेगा इसलिए किसान आंदोलन खड़ा कर दिया है, आंदोलन में ड्राई फ़्रूट्स बँट रहे हैं!’ क्या शहरों में रहने वाले लोग किसान आंदोलन से ऊब गए हैं? क्या उन्हें किसानों की माँगें समझ में आयी हैं? कैसे किसान अन्नदाता बन गए और क्यूँ? ये सब कुछ, इस बातचीत में जो शहरी लोगों को ज़रूर सुनना चाहिए।

फ़सल की MSP की गारंटी पर बात कैसे बने?

राहुल गांधी ने सदन में ११ फ़रवरी को कृषि क़ानून को लेकर सरकार के content और इंटेंट पर जवाब देते हुए तीखा हमला बोला, इस सब के बीच PM मोदी पहले ही सदन में अपनी मंशा साफ़ कर चुके हैं कि कृषि क़ानून ज़रूरी हैं, बदलाव की बयार में निजी निवेश भी ज़रूरी है, ऐसे में MSP की गारंटी ना होने पर किसानों ने आंदोलन और तीखा कर दिया है, इस बातचीत में इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से चर्चा, MSP की माँग क्यूँ है ज़रूरी? क्या हो सकता है MSP का फ़ॉर्म्युला?
सुनिए वरिष्ठ किसान नेता के विचार, तीखी मगर सीधी बात!

मोदी ने संसद से किसानों को फिर दिया ‘विकास’ का मंत्र

लोक सभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब देते हुए PM मोदी ने कृषि क़ानूनों पर अपनी सोच और मंशा साफ़ कर दी, उन्होंने कहा कि ‘Status quo’ की मानसिकता देश को डुबा रही है और आवश्यकता अनुसार बदलाव ही वक़्त की ज़रूरत है, असफलता के डर से अटकना सही नहीं और इसी माहौल में उन्होंने संसद में विरोध के सुर के साथ-साथ कृषि क़ानूनों को सही ठहराया।
उन्होंने ज़ोर दिया की काले क़ानून के ‘color’ पर नहीं ‘content’ और ‘intent’ की बात की जाए,
सुनिए इस पर ऑल इंडिया किसान सभा के जनरल सेक्रेटेरी, संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य और लोक सभा में ८ बार सांसद रहे Hannan Mollah जी का क्या कहना है, तीखी मगर सीधी बात!