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केंद्र के अध्यादेशों के खिलाफ सड़कों पर उतरे किसान

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा.

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

किसानों ने निकाली ट्रेक्टर ट्रॉली रैली, हरियाणा में महंगा हुआ कपास का बीमा, खरीफ बुआई पर नहीं पड़ा कोरोना का असर, 21.20% बढ़ा रकबा

पाम ऑयल मिशन को लेकर नॉर्थ-ईस्ट में उपजी आशंकाएं

“हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं लिया गया। नॉर्थ ईस्ट में पाम ऑयल मिशन ठीक नहीं है क्योंकि मेघालय में हम आदिवासियों का जीवन प्रकृति से जुड़ा है और पर्यावरण पर इसका बुरा असर पड़ेगा। आपने किससे पूछकर यह मिशन लागू किया? यहां के मुख्यमंत्री की बहन और तुरा संसदीय क्षेत्र से सांसद अगाथा संगमा, पर्यावरण मंत्री, विपक्षी दलों के सदस्य और किसानी से जुड़े हम जैसे लोग मना कर रहे हैं फिर आपने किस आधार पर यह फैसला लिया?”

मेघालय में किसानों के साथ काम करने वाले भोगतोराम मावरोह नॉर्थ ईस्ट स्लो फूड एंड एग्रो बायोडायवर्सिटी सोसायटी (NESFAS) के सीनियर एसोसिएट एंड रिसर्चर हैं। केंद्र सरकार के नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पाम को लेकर उनकी कई आशंकाएं और आपत्तियां हैं। ‘हिंद किसान’ के साथ हुई एक खास बातचीत में उन्होंने बताया कि देश की खाद्य सुरक्षा बहुत हद तक जंगलों पर निर्भर करती है। हमारे सामने उदाहरण है कि किस तरह मलेशिया और इंडोनेशिया के जंगल ताड़ की खेती के कारण बर्बाद हो गए।

नॉर्थ ईस्ट स्लो फूड एंड एग्रो बायोडायवर्सिटी सोसायटी द्वारा दो साल पहले की गई एक रिसर्च को सामने रखते हुए भोगतोराम बताते हैं कि नागालैंड और मेघालय में औसतन हर एक गांव में परंपरागत तौर पर करीब 200 तरह के पौधे और कई तरह की फसलें होती हैं। फल, सब्जियों और मशरूम के रूप में जंगलों से भोजन प्राप्त होता है। जहां धान उगाया जाता है उसके आसपास भी इतना पानी होता है कि बहुत सारी झाड़ियां और फसलें उगाई जाती हैं। ऐसा ही कुछ इंडोनेशिया में भी सालों पहले होता था लेकिन जब से वहां पाम ऑयल के लिए ताड़ की खेती का अंधाधुंध विस्तार हुआ और कैमिकल फार्मिंग को बढ़ावा मिला तब से प्रकृति के साथ पूरा तालमेल बिगड़ गया है।

ताड़ की खेती खासतौर से कॉरपोरेट और इंडस्ट्रियल प्लांटेशन के तौर पर बड़े पैमाने पर होती है। इसमें फल आने में समय लगता है यानि जेस्टेशन पीरियड 3-4 साल का होता है जो कि सामान्य फसलों के मुकाबले अधिक है। इसलिए किसानों को हैंड होल्डिंग की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि बड़े पैमाने पर किसी मदद के बिना किसान के लिए ताड़ की खेती करना संभव नहीं है। इस खेती में कैमिकल, पेस्टिसाइड का इस्तेमाल, बड़ी मशीनों का उपयोग, अधिक जल दोहन के साथ-साथ तेल निकालने के बाद वेस्ट मैनेजमेंट और रीसाइक्लिंग के लिए भी काफी निवेश की जरूरत पड़ती है।

भारत सरकार ने 18 अगस्त, 2021 को नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पाम को मंजूरी दी थी। इसके लिए पूर्वोत्तर भारत के राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में ताड़ की खेती के लिए 11,040 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। इसमें केंद्र सरकार 8,844 करोड़ रुपये और राज्य सरकारें 2,196 करोड़ रुपये खर्च करेंगी। योजना का मकसद देश में पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाकर खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता को कम करना है। पिछले साल भारत के करीब 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के खाद्य तेलों का आयात हुआ है। ऐसे में भारत सरकार की सोच है कि इंपोर्ट बिल को कम करने के लिए देश में ही ताड़ की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकेगा। भारत में फिलहाल लगभग 3.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ताड़ की खेती होती है जिसे 2025-26 तक बढ़ाकर 10 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। बताया जा रहा है कि पाम ऑयल मिशन से कृषि में निवेश बढ़ेगा और छोटे किसानों की आय, क्षमता और रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा।

अन्य तिलहन फसलों जैसे मूंगफली, सरसों, नारियल के मुकाबले ताड़ की खेती में 10-46 गुना ज्यादा तेल प्रति हेक्टेयर निकलता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंपोर्ट बिल कम करना और उत्पादकता बढ़ाना ही एकमात्र लक्ष्य है जिसके लिए इतना बड़ा नीतिगत फैसला ले लिया गया? क्या इस योजना के जैव विविधता, पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और जन स्वास्थ्य पर प्रभाव का आकलन किया गया है?

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पाम ऑयल मिशन के बारे में कहा है कि ताड़ की खेती साइंटिफिक स्टडी पर आधारित है। इससे प्रकृति में संतुलन बैठेगा। कुल 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होने वाली खेती में से नॉर्थ ईस्ट में लगभग 9 लाख हेक्टेयर में ही ताड़ की खेती प्रस्तावित है। इसलिए इसमें डर कैसा? इस पर भोगतोराम मावरोह कहते हैं, “हमारा इलाका पूरे भारत के सामने बहुत छोटा है, उस लिहाज़ से 9 लाख हेक्टेयर में ताड़ की खेती करना हमारे लिहाज से बहुत बड़ा रकबा होगा। भारत में 33 फीसदी वन क्षेत्र होना चाहिए लेकिन पर्वतीय क्षेत्र होने की वजह से पूर्वोत्तर भारत में 60 फीसदी वन क्षेत्र है। ऐसे में ताड़ की खेती के लिए जमीन कहां से आएगी? पहाड़ी इलाकों में अभी भी खेती होती है। क्या उस जगह पर ताड़ की खेती होगी? इसका जैव-विविधता और खाद्य सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा? किसी ने सोचा है?’’

भोगतोराम आगे मानते हैं, “इंडस्ट्रीयल प्लांटेशन लाकर आप मोनोकल्चर यानी एक ही तरह की फसल को बढ़ावा देंगे जो कि पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा के लिए हानिकारक है। एक तरफ नीति आयोग कहता है कि सतत विकास लक्ष्य (SDG) की तरफ अगो बढ़ना है। जलवायु परिवर्तन का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने की जरूरत है या फिर बड़े पैमाने पर ताड़ की खेती को बढ़ावा देकर मोनोकल्चर अपनाने की? इस मामले में सरकारी नीतियों में विरोधाभास क्यों है?”

यह सवाल यह भी उठता है कि जो किसान जैव-विवधता वाली परंपरागत खेती से अपना गुजारा कर रहे हैं उन्हें पौष्टिक खान-पान और फसल विविधता से दूर क्यों किया जा रहा है? भोगतोराम के मुताबिक, “हम झूम खेती में दर्जनों तरह की फसलें उगाते हैं। हमारे छोटे किसानों को एमएसपी का लाभ क्यों नहीं मिलता? जो हम उगाते हैं उसी खेती को लाभकारी बनाने को लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं है? ताड़ की खेती के भरोसे सतत विकास लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा समाज और पर्यावरण पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।”

मेघालय की सांसद अगाथा संगमा ने भी पाम ऑयल मिशन को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। इस बारे में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर इस फैसले पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में अधिकतर खेती की जमीन गांव की होती है और ग्राम पंचायत से जमीन पट्टे पर लेकर किसान खेती करते हैं। किसानों को आशंका है कि अगर ताड़ की खेती बड़े पैमाने पर होगी तो जमीन कॉरपोरेट्स के हाथों में चली जाएगी। इस तरह भूमि पर समुदाय का स्वामित्व खत्म हो जाएगा। पाम ऑयल मिशन के कारण किसानों को उनकी जमीन से बेदखल किए जाने का डर है।

इंडोनेशिया के आदिवासी समाज ‘दायक’ का अनुभव भी कुछ इसी तरह का रहा है। वहां के आदिवासियों से ताड़ की खेती के लिए जमीन ली गई थी। बाद में खेती की रखवाली के लिए उसी समाज के लोगों को सुरक्षा गार्ड की नौकरी पर रखा गया। पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ने से पहले इंडोनेशिया के अनुभवों पर गौर करना चाहिए। इस साल अप्रैल में श्रीलंका ने पाम ऑयल के आयात पर पाबंदी लगा दी है और धीरे धीरे ताड़ की खेती की बजाय रबर की खेती को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। यूरोपीय संघ भी 2018 में इसी तरह का कदम उठा चुका है। जबकि भारत सरकार ताड़ की खेती को बढ़ावा देने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जैसी व्यवस्था लागू करने की तैयारी है। इसके अलावा प्रति हेक्टेर सहायता राशि जैसे प्रोत्साहन देने की योजना है।

उत्तर पूर्वी राज्यों में चाय बागान की स्थिति पर शोध कर रहे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कॉलर अंगशुमान सरमा कहते हैं, “भले ही सरकार ने ताड़ की खेती के मामले में पूर्वोत्तर में एमएसपी जैसी व्यवस्था देने का वादा किया है लेकिन यह सब एक दिखावा है। किसानों ने ऐसा कुछ मांगा नहीं और आगे यह मिलेगा इसकी गारंटी भी नहीं है। सरकार कई फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है लेकिन किसानों को एक तो यह मिलता नहीं, दूसरी यह नाकाफी है।” अंगशुमान बताते हैं कि चाय की खेती कर रहे छोटे किसानों के लिए भी मिनिमम बेस प्राइस घोषित है लेकिन वो भी किसान को नहीं मिलता है। कुछ ऐसा ही हाल ताड़ की खेती करने वाले किसानों का भी हो सकता है।” वह मानते हैं कि देश की खाद्य सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और जैव विविधता पर इस मिशन का प्रतिकूल प्रभाव होगा।

Palm Oil की खेती से क्या हैं नुक़सान?

National Mission on Edible oils- Oil Palm को सरकार ने 18 August 2021 को हरी झंडी दिखाई, खाने के तेल,Palm oil को Environment, Ecology और Health की दृष्टि से ख़तरनाक माना जाता रहा है लेकिन खाने के तेल के मामले में इंपोर्ट बिल कम रखने की ताक में सरकार ने ये फ़ैसला लिया है।
कितना सोचा समझा फ़ैसला है ये, इस फ़ैसले को North East के किसान किस तरह देख रहे हैं? क्या उनसे रायशुमारी की गयी, देखिए ‘Hind Kisan’ की ये ख़ास बातचीत Meghalaya Shillong से North East Slow Food and Agro Biodiversity Society के Senior Associate and Researcher- Bhogtoram Mawroh से।

MSP का खेल निराला, क्या है कुछ काला?

सरकार ने किसान आंदोलन के बीच रबी मार्केटिंग सीज़न 2022-23 के लिए फसलों की MSP का एलान किया है, सरकार फसलों के भाव में 2%- 8.6% तक वृद्धि का दावा कर अपनी पीठ थपथपा रही है तो वहीं किसान नेता और एक्स्पर्ट्स इसे भ्रामक बता रहे हैं।
उनके मुताबिक़ अगर महंगाई को जोड़ दिया जाए तो ये वृद्धि ना के बराबर है,
गेहूँ में कवल 40 RS/Q की वृद्धि के पीछे सरकार का किसानों को क्या कोई छुपा संदेश है?
साथ ही कृषि क़ानून पर Supreme कोर्ट द्वारा गठित कमिटी के सदस्य और किसान नेता अनिल घनवत ने CJI को लिखी चिट्ठी, कहा committee की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
क्या टाइमिंग ख़ास है, इससे किसान और सरकार के बीच जारी गतिरोध में कोई फ़र्क़ पड़ेगा?
सुनिए हिंद किसान की ये ख़ास बातचीत, खेती किसानी के मामलों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार Harvir Singh जी के साथ।

Karnal: किसानों ने सचिवालय पर डाला डेरा, सुनेगी सरकार?

मुज़फ़्फ़रनगर 5 September और फिर 7 September को हफ़्ते में दूसरी बड़ी किसान महापंचायत, किसानों ने अपनी माँग को पुरज़ोर तरीक़े से रखते हुए हरियाणा के लघु सचिवालय पर डेरा जमा लिया है, दिन भर बातचीत का दौर और फिर करनाल अनाज मंडी से सचिवालय की ओर बढ़ते कदम, आख़िरकार शांतिपूर्ण तरीक़े से किसानों ने सचिवालय पर डेरा दाल दिया है , गेंद प्रशासन के पाले में है।
27 August को किसानों पर हुए लाठी चार्ज और उससे घायल किसानों को मुआवज़ा और सर फोड़ देने का निर्देश देने वाले SDM के ख़िलाफ़ पर्चा भरने की माँग के साथ किसान डटे हुए हैं, प्रशासन क्या और कब फ़ैसला लेता है , इसका बेसब्री से इंतजार है।
दिनभर की ‘आँखों देखी’ – ग्रामीण भारत कवर करने वाले पत्रकार Mandeep Punia के साथ जो कि ‘Gaon Savera’ से जुड़े हैं।

UP – Muzaffarnagar किसानों की हुंकार से होगा बदलाव?

5 September,2021, UP के मुज़फ़्फ़रनगर में किसानों की महापंचायत किन किन मायनो में अहम रही? ये किसानों का खुद का शक्ति परीक्षण था, शक्ति प्रदर्शन था या फिर दोनों?
क्या था नज़ारा, किन मुद्दों पर छिड़ी बात?
Mission UP, Uttarakhand का हुआ आग़ाज़, ‘वोट की चोट’ का क्या होगा असर?
इन सब पर देखिए ‘आँखो देखी’ #HindKisan पर, कृषि पत्रकार और Asli Bharat के founder Ajeet Singh के साथ।

हरियाणा: समझें भूमि अधिग्रहण विधेयक की बारीकियाँ

हाल ही में हरियाणा विधान सभा में सम्पन्न हुए मान्सून सेशन में हरियाणा सरकार ने भूमि अधिग्रहण क़ानून – Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement (Haryana Amendment)Bill, 2021 में संशोधन कर डाला है, हालाँकि इसे अभी राष्ट्रपति के पास मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा लेकिन, विपक्ष समेत तमाम किसान संगठन, तीन कृषि क़ानून के बाद अब इस संशोधन को किसानों पर एक और प्रहार की तरह देख रहे हैं।
क्यूँ कर रहे हैं किसान इस संशोधन का विरोध, हरियाणा में किसानों की ज़मीन पर PPP मॉडल से क्या ख़तरा मँडरा रहा है, ये समझने के लिए ‘Hind Kisan’ ने बातचीत की ‘हरियाणा भूमि बचाओ संघर्ष समिति’ के संयोजक, Dr Shamsher Singh से।

किसान आंदोलन: कितना मज़बूत, कितना जोश बाक़ी?

26 August,2021 को किसान आंदोलन के 9 महीने पूरे हो गए, सरकार और किसमनों के बीच गतिरोध जारी है, आंदोलन करते हुए लम्बे अंतराल के बाद भी किसानों में कैसा है जोश?
क्या है आगे की रणनीति? किसानों के मुद्दों में तीन कृषि क़ानून और MSP की गारंटी के साथ साथ और कौन से मुद्दे जुड़ते चले जा रहे हैं? विदेश के किसान इस एतिहासिक आंदोलन को किस नज़र से देख रहे हैं? इन सब मुद्दों पर किसान नेता #RakeshTikait से बेबाक़ बातचीत, सुनिए #HindKisan पर।

हिमाचल के सेब किसानों के भाव लुढ़के, कैसे सुधरे हालात?

हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों को अडानी ग्रूप ने ज़ोरदार झटका दिया है, Adani Agri Fresh ने 26 August – 29 August तक किसानों से ख़रीदे जाने वाले सेब के दाम खोल दिए हैं और भाव 16 Rs/kilo तक घटा दिए हैं, ऐसे में दूसरी निजी कम्पनी के भाव पर भी असर पड़ना लाज़मी है, हालाँकि कम्पनी का दावा है कि बाज़ार में देख पड़ताल करने के बाद ही रेट्स खोले है, किसानों से फ़ीड्बैक भी लिया है लेकिन सेब उत्पादक सही भाव ना मिलने, लागत बढ़ने के बीच विदेशी सेब से होने वाले मुक़ाबले को लेकर भी परेशान है।
सेब उत्पादकों की माँग है की कश्मीर की तर्ज़ पर उनके सेब को भी NAFED जैसी एजेन्सी ख़रीदे और MIS – मंडी इंटर्वेन्शन स्कीम के तहत किसानों के सेब की ख़रीदी हो ताकि निजी कम्पनी अपने मनमाने भाव लाने से बचे, इन सभी मुद्दों पर सेब बागवानो के पक्ष को समझने के लिए सुनिए ‘Hind Kisan’ की ये ख़ास बातचीत, Ramesh Chauhan से जो कि Himachal Pradesh – Fruits, Vegetables and Flowers Association के President हैं।

कृषि क़ानून: पहाड़ों में खेती के लिए ख़तरा?

पहाड़ों के लिए monoculture यानी एक ही तरह की फसल उगाना अभिशाप होगा, देसी बीज का इस्तेमाल, पारम्परिक मोटे अनाज, झाड़ियाँ, 12 नाजा प्रणाली से फसल उगाना, प्रकृति संसाधनों और गुणों को समाए पहाड़ की खेती से पोषण और शारीरिक लाभ पाने की नितांत सम्भावनाएँ हैं लेकिन ठेका खेती क़ानून आने से इन सब पर ख़तरा मंडरा रहा है, ज़मीन से ही किसानों का अस्तित्व है, खेती बचेगी तो देश बचेगा।
सुनिए उत्तराखंड के स्थानीय सामाजिक और कृषि ऐक्टिविस्ट, AGAAS Federation के Founder Chairperson JPMaithani के साथ ‘मिशन उत्तराखंड’ पर उनके विचार और सुझाव।

Mission Uttarakhand: कैसे हो खेती का विकास?

देखिए #HindKisan की ख़ास बातचीत, Uttarakhand के सामाजिक कार्यकर्ता और फार्म ऐक्टिविस्ट #JPMaithani से जो कि उत्तराखंड के चमोली – देहरादून इलाक़े में बाग़वानी, किसानी के मुद्दों पर पिछले २३-२४ साल से काम कर रहे हैं।
ये #AAGAASFederation के Founder- Chairperson हैं, इनकी नज़र में #उत्तराखंड_मिशन’ में क्या मुद्दे शामिल होने चाहिए ताकि किसान मुनाफ़े की खेती कर सकें और अपनी उपज और मेहनत का सही भाव ले सकें। MSP का मुद्दा क्यूँ अहम है, कृषि मंडियाँ क्यूँ ज़रूरी है और ठेका खेती क़ानून से पहाड़ी इलाक़ों के किसानों को क्या ख़तरा है? समझिए।

कृषि क़ानून: आदिवासी समाज पर क्या असर?

9 August का दिन कई मायनों में ख़ास है, 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ की ही तर्ज़ पर किसानों ने ‘Corporate भगाओ, खेती बचाओ’ का नारा दिया गया, देश के अलग अलग राज्यों में किसानों ने इस आंदोलन में अपनी भागीदारी की, साथ ही 9 August ‘विश्व आदिवासी दिवस’ भी है, इस मौक़े पर आदिवासी किसानों की क्या दशा है, दिक़्क़तें है, कृषि क़ानूनों का आदिवासी इलाक़ों में क्या प्रभाव, क्या भविष्य होगा? आदिवासी समाज को विकास की धारा में लाने के लिए जो नीतिगत फ़ैसले लिए जा रहे है उस पर क्या है उनकी सोच, इन दोनों ही अहम मुद्दों पर ‘हिंद किसान’ ने बातचीत की छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष, संजय पराते जी से।

MP: मूँग, सोयाबीन के किसानों के ज़मीनी हालात

ख़बर है कि पोल्ट्री उद्योग को सस्ते भाव में सोयाबीन अपलब्ध कराने के मक़सद से सरकार 15 लाख मेट्रिक tonne सोयाबीन आयात करने की अनुमति दे सकती है, इस आयात से सोयाबीन के किसानों पर क्या असर पड़ेगा, उनकी क्या प्रतिक्रिया है, संतुलन कैसे बैठाया जाए?
‘Soya state’ कहलाये जाने वाले राज्य MP के लिए क्या हैं चुनौतियाँ?
साथ ही, भारी वर्षा के बीच सरकार ने मूँग के किसानों की दाल की ख़रीदी फिर से शुरू करने का एलान किया है, कोटा पिछली बार से ज़्यादा बढ़ा भी दिया है, इस फ़ैसले से मूँग के किसानों में ख़ुशी की लहर है या दाल की ख़रीदी में कुछ काला है?
समझते हैं, किसानों की ‘मन की बात’, हिंद किसान पर मध्य प्रदेश से किसान नेता केदार सिरोही के साथ।

विश्व बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के लिए MSP क्यूँ है ज़रूरी?

संसद के साथ साथ ‘किसान संसद’ को 6 अगस्त को 12 दिन पूरे हो गए हैं, किसान आंदोलन का 253वाँ दिन लेकिन किसानों की सबसे बड़ी माँग, फ़सल का Minimum support price यानी MSP पर सरकार कोई आश्वासन देने या बातचीत करने से बच रही है, एक दलील ये सामने आ रही है है कि जब ग्लोबल इकॉनमी में फसलों के भाव तय होते हैं तो भारत के किसानों को MSP की गारंटी देने का मुद्दा व्यावहारिक नहीं, इससे सवाल उठता है कि अगर भारत के किसानों को दुनिया के किसानों के साथ मुक़ाबला करना है तो उनके लिए MSP मिलना और कितना ज़रूरी हो जाता है?
इसी ख़ास विषय पर सुनिए हिंद किसान की ये ख़ास बातचीत, जाने माने कृषि अर्थशास्त्री, Food and Agriculture Policy Expert, Devinder Sharma ji के साथ, सुनिए और समझ बनाइए।

उत्तराखंड मिशन: क्या है पर्वतीय इलाक़ों के खेती के मुद्दे?

कृषि आंदोलन: ‘मिशन उत्तराखंड’ क्या चाहते हैं किसान?
संयुक्त किसान मोर्चा ने 26 July लखनऊ से मिशन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का एलान किया, 5 September को मुज़फ़्फ़रनगर में महारैली से इस मिशन की असल में शुरुआत होगी, 3 कृषि क़ानूनों को रद्द करने और MSP की गारंटी के साथ प्रदेश के खेती किसानी से जुड़े स्थानीय मुद्दे भी उठाए जाएँगे, ऐसे में उत्तराखंड और तराई क्षेत्र के किसानों की क्या हैं ख़ास समस्याएँ,
कृषि आंदोलन से उनका कितना जुड़ाव है? क्या हैं उनके असल मुद्दे? ख़ासतौर से पहाड़ी इलाक़ों पर फ़ोकस रखते हुए सुनिए हिंद किसान की ये अहम बातचीत – #TERAIKisanSangathan के अध्यक्ष, Tajinder Virk के साथ।

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर ख़ास!

हीरा या हरियाली – दौलत या सेहत?
मध्य प्रदेश, बुदेलखंड – छतरपुर इलाक़े में बक्सवाहा जंगलों की ऑक्सिजन पर हीरे की जगमगाहट भारी पड़ रही है। #SaveBuxwahaForest’ का नेतृत्व कर रहे पर्यावरण प्रेमी और युवा स्टूडेंट आशिक़ मंसूरी से सुनिए ये दिल की बात!

महिला की रसोई का बजट भी जुड़ा है कृषि क़ानून से!

Hind Kisan में बातचीत पंजाब से ऑल इंडिया किसान सभा की सदस्या, #KanwaljitDhillon से, 26 July को महिला किसान संसद में हिस्सा लेने वाली असंख्य महिलाओं में से ये भी एक थी।
बातचीत के दौरान इन्होंने इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने पलटे जिन्हें जानना ज़रूरी है, कृषि क़ानून के ज़रिए सरकार द्वारा खेती किसानी के विकास की जो इबारत लिखने की कोशिश हो रही है उसे गाँव क़स्बों में रह रही महिलाएँ कैसे देख रही हैं, उनके क्या अनुभव हैं, उनकी कितनी गहरी समझ है?
रोज़मर्रा में वो किन दिक्कतों को झेल रही है और खेती में क्या बदलाव चाहती हैं?
ये सब समझने के लिए सुनिए राजनीति से परे ये ख़ास बातचीत।

‘महिला किसान संसद’ में क्या रहा ख़ास!

26 July को देश की राजधानी दिल्ली में संसद के निकट ‘महिला किसान संसद’ चली क्या था उसका मक़सद? कितने राज्यों की महिलाओं ने भागीदारी की? महिलाओं ने तीन कृषि क़ानूनों पर कितने तार्किक सवाल जवाब किए? तीन कृषि क़ानून से कितने करीबी से जुड़े हैं पोषण, भूख, समता, न्याय और महिला किसानों की भागीदारी और रोज़गार के मुद्दे? कॉर्प्रॉट खेती से क्या डर है? इसके अलावा और भी तमाम मुद्दे जो महिलाओं कि रसोई और बजट से जुड़े हैं, क्या है उनका कृषि क़ानून से नाता? इन सब पर सुनिए महिलाओं की बेबाक़ राय, आँखों देखी #महिला_किसान_संसद की कार्रवाई, फार्म ऐक्टिविस्ट #MedhaPatekar की ज़ुबानी।

‘किसान संसद’ पर आँखों-देखी!

संसद के साथ साथ 13 August तक किसान_संसद भी चालू है, दोनों संसदों की कार्रवाही में क्या समानताएँ हैं, कैसे चलती है किसान संसद?
कितनी गहन चर्चा होती है तमाम कृषि क़ानूनों पर?
बाहर के राज्यों से आए किसानों की इसमें कितनी भागीदारी है?
दिन भर किसान संसद का क्या स्वरूप रहता है?
सरकार का क्या रुख़ है और रवैया है?
इन सब दिलचस्प बिंदुओं पर बातचीत former Director- Policy and Outreach, National Seed Association of India और Agriculture से जुड़े मुद्दों पर Writer,
Indra Shekhar Singh के साथ सुनिए Hind Kisan की ख़ास बातचीत।
Indra Shekhar पिछले कई महीनों से किसान आंदोलन को कवर कर रहे हैं और आज की बातचीत उन्हीं की आँखो-देखी और अनुभव को सामने रखती है।

संसद के बाहर ‘किसान संसद’, क्या निकलेगा हल?

संसद के monsoon सत्र के साथ साथ किसान भी संसद के निकट अपनी ‘किसान संसद’ लगा रहे हैं, देश के अलग अलग राज्यों से किसान इसमें अपना विचार रखने, अपनी माँग के समर्थन में आ रहे हैं, ऐसे में किसानों पर राजनीति करने और उनके नक़ली किसान होने के आरोप भी लग रहे हैं, क्या है उनके मन की बात? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात को पुरज़ोर तरीक़े से रखने को राजनीति कहेंगे? क्या MSP की गारंटी देना नामुमकिन है?
सुनिए ‘Hind Kisan’ की ये ख़ास बातचीत, किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष, चौधरी Pushpendra Singh के साथ, बनाइए कृषि से जुड़े मुद्दों पर अपनी समझ।

किसान संसद: तकरार जारी, क्या निकलेगा हल?

किसान_संसद

सरकार का कहना है की कृषि क़ानूनों पर सरकार ने विशेषज्ञों और आर्थिक जानकारों से सलाह कर बेहतरीन सुझाव दिए लेकिन किसानों को वो मंज़ूर नहीं अब किसान ही सुझाव दें तो बात आगे बढ़े।
किसान संगठनों का कहना है की वो कृषि क़ानूनों को लेकर और #MSP पर अपनी आपत्ति बता चुके हैं, वो संशोधन नहीं चाहते, MSP की गारंटी चाहते हैं और सरकार से अपील कर रहे है कि खेती को कोरपोरटेस का हवाले ना किया जाए, सुनिए बातचीत का ये अंश।

AllIndiakisanMazdoorSabha के महासचिव डॉक्टर आशीष मित्तल और NAFED के डिरेक्टर, अशोक ठाकुर के साथ #HindKisan की ये ख़ास डिबेट।