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  • Apr. 26, 2018

विश्व बैंक के सुझावों की क्या अहमियत है, इसे हम तभी समझ सकते हैं अगर हम गुजरे सात दशकों के दौरान विश्व अर्थव्यवस्था में रही इस संस्था की भूमिका पर ग़ौर करें। 1944 के ब्रेटनवुड्स करार के तहत वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)का गठन हुआथा। मकसद दूसरे विश्व युद्ध में हुई भारी तबाही के बाद अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करना था। अपनी स्थापना के समय से ये दोनों संस्थाएं पूंजीवादी दुनिया में वित्तीय एवं आर्थिक “बौद्धिक गुरु” के रोल में रही हैं।

सोवियत दौर में, जब दो तरह की व्यवस्थाओं एवं विचारधाराओं की होड़ थी, तब ब्रेटन वुड्स संस्थाएं नव-उदारवादी नीतियों को स्वीकृति दिलाने के लिए ज़ोरदार अभियान चलाती थीं। नव-उदारवादी आर्थिक विकास का रास्ता अपनाने के लिएतीसरी दुनिया के देशों को वो न सिर्फ़ प्रेरित करती थीं, बल्कि जहां मौका मिला, उन्होंने ज़बरन इन नीतियों को थोपा भी। ख़ासकर जब कोई देश भुगतान संतुलन की मुश्किलों में फंस जाता था, तब वे इसी शर्त पर क़र्ज़ देती थीं कि वो उनकी बताई नीतियों का पालन करेंगे। 1981-82 में भारत ने पहली बार IMF से ऋण लिया, तो उसे भी ऐसी शर्तों का सामना करना पड़ा।

सोवियत संघ के विखंडन के साथ पूंजीवाद को चुनौती देने वाले विचार का लोप होने लगा। तब वर्ल्ड बैंक और IMF की देखरेख में तैयार हुई सहमति को “वॉशिंगटन कॉन्सेंसस” नाम से जाना गया। इस सहमति का सार यह है कि अब दुनिया में अर्थव्यवस्था के विकास के एकमात्र वही रास्ता है, जिसका नुस्खा ब्रेटन वुड्स संस्थाएं बताती हैं। इसीलिए आज के दौर में विश्व बैंक कोई सलाह देता है, तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अब विश्व बैंक एक ऐसा सुझाव देने की तैयारी में है, जिसका सीधा मतलब प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले मज़दूर वर्ग के लिए नौकरी की बची-खुची सुरक्षाओं को ख़त्म करना होगा। 2019 की वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट का मसविदा पिछले दिनों विश्व बैंक ने जारी किया। बेशक, अभी यह अंतिम रिपोर्ट नहीं है। फ़िलहाल, इसे राय-मशविरे के लिए जारी किया गया है। इसके बावज़ूद इससे विश्व बैंक के अंदर चल रही सोच की साफ झलक मिलती है। सोच यह है कि निजी क्षेत्र को कर्मचारियों के प्रति सभी तरह की ज़िम्मेदारियों/जवाबदेहियों से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि पूंजीपतियों को मनमाने ढंग से कर्मचारियों को रखने-हटाने, उनकी सेवा शर्तें तय करने और उनसे बेलगाम व्यवहार करने की छूट मिलनी चाहिए।

इस मसविदे में न्यूनतम वेतन, स्थायी नौकरी, नौकरी ख़त्म होने पर मुआवज़ा देने की बाध्यता आदि जैसी परिपाटियों को “पुरानी पड़ गई अवधारणा” बताया गया है। कहा गया है कि अब श्रम क़ानूनों (वो क़ानून जो मज़दूर वर्ग कोसुरक्षा देते हैं) की ज़रूरत नहीं रही। साथ ही वकालत की गई है कि मज़दूरी को उत्पादकता से जोड़ा जाए। यानी कोई कर्मचारी जितना उत्पादन करेगा, उसे उसी अनुपात में वेतन मिले। हैरतअंगेज़ यह है कि दस्तावेज़ में ये सारी सिफ़ारिशें जिस अध्याय में लिखी गई हैं, उसे ‘कर्मचारियों को संरक्षण’ नाम दिया गया है।

अंतिम दस्तावेज़ में इन अनुशंसाओं में कोई बदलाव होगा, इसकी संभावना कम है। वैसे भी कम-से-कम अपने देश में इन नुस्खों को पहले ही अपनाया जा चुका है। नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद से “श्रम सुधारों” को अपना एजेंडा बना रखा है। हाल में फिक्स्ड टर्म नौकरियों को क़ानूनी मान्यता दी गई, जिसका मतलब स्थायी नौकरियों के चलन का ख़त्म करना माना गया है। स्थायी नौकरी का चलन ख़त्म होगा, तो नौकरी ख़त्म होने पर मुआवज़ा या किसी दूसरी तरह की सुविधा देने का सवाल ही नहीं बचेगा।

वर्ल्ड बैंक और IMF का यह पुराना तरीक़ा है कि वे मीठी चासनी चढ़ाकर अपने मारक सुझावों पर पेश करते हैं। इस बार भी ऐसा ही किया गया है। कहा गया है कि सामाजिक सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी सरकारें लें। वे अपने नागरिकों के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) और सामाजिक बीमा की व्यवस्था करें। मगर UBI के लिए धन कहां से आएगा? UBI की सोच यह है कि इसके तहत हर नागरिक को एक निश्चित रक़म सरकार हर महीने देगी। वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि सरकारें चाहें, तो वो ऐसा करते समय ग़रीब और पिछड़े वर्गों को ज़्यादा रक़म दे सकती हैं। बहरहाल ये ज़ाहिर है कि इस योजना के लिए अभी चल रही सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में ही कटौती की जाएगी।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन पहले ही कमज़ोर हो चुका है। इसलिए ऐसे नव-उदारवादी एजेंडे को वैचारिक और ज़मीनी चुनौती देने वाली ताकत की आज भारी कमी है। फिर भी इस नए नुस्खे को चर्चा में लाने की ज़रूरत है। ये बात पूरी ताक़त से कही जानी चाहिए कि मेहनतकश तबक़ों को 19वीं सदी में धकेलने की कोशिश को 21सदी में क़ामयाब नहीं होने दिया जाएगा।