Archive

  • |
  • Mar. 12, 2018

मांगें फ़ौरी हैं, लेकिन उनका संदर्भ और प्रभाव दूरगामी है। इसीलिए मध्य प्रदेश के धार जिले में चल रहा आदिवासियों का आंदोलन अनोखा है। अनूठापन यह है कि इसमें भारतीय संविधान को अपना प्रमुख मार्ग-दर्शक बनाया गया है। ज़ोर इस पर है कि आंदोलन की मांगें बस वही हैं, जो भारतीय संविधान के तहत वहां के लोगों का अधिकार हैं। और बात यहीं तक सीमित नहीं है। बल्कि इन अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए आंदोलन के कार्यकर्ता गांव-गांव में भारतीय संविधान की प्रतियां ले जाकर लोगों को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस तरह ये चेतना लाने की कोशिश हो रही है कि भारतीय संविधान से मिले हक़ से स्थानीय आबादी को वंचित किया जा रहा है, जिसे वे स्वीकार नहीं करेंगे।

फ़ौरी मुद्दे विस्थापन, पुनर्वास और मुआवजे से जुड़े हैं। धार जिले की मनावर तहसील में अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्टरी के लिए 32 गांवों में ज़मीन का अधिग्रहण हुआ। ये इलाका संविधान की अनुसूची के पांच के तहत आता है। यानी यह आदिवासी क्षेत्र है। यहां के लिए नीति यह है कि अधिग्रहण के मामलों में ज़मीन के बदले ज़मीन दी जाएगी, पुनर्वास की जगह पर स्कूल और अस्पताल बनाए जाएंगे, विस्थापित परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी और 60 साल से अधिक उम्र वाले लोगों को पेंशन दी जाएगी। आंदोलनकारी नेताओं का इल्जाम है कि इन शर्तों पर आंशिक अमल ही हुआ है। नीति यह भी है कि किसी परियोजना के लिए जहां तक संभव हो, बंजर भूमि का अधिग्रहण होगा। लेकिन इस मामले में 32 गांवों की पूरी तरह उपजाऊ ज़मीन ली गई।

दरअसल, अनुसूची पांच के तहत आने वाले क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है। साथ ही अनुसूचित इलाकों में पंचायती राज कानून के विस्तार के लिए बने अधिनियम- पेसा- के तहत इन क्षेत्रों में रहने वाली वनवासी आबादी को कुछ विशेष संरक्षण मिले हुए हैं। उसके तहत ग्राम सभा को विशेष अधिकार दिए गए हैं। वन-अधिकार कानून और 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत विस्थापितों को खास कानूनी हक़ मिले हैँ। आंदोलनकारी नेताओं का इल्जाम है कि मनावर तहसील में इन सभी प्रावधानों की अनदेखी की जा रही है। तो अब स्थानीय आबादी “इंसाफ़” और अपने संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सड़कों पर उतरी है।


आंदोलन के नेता पढ़े-लिखे हैं। उन्होंने संविधान के प्रावधानों का अध्ययन किया है। संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के बारे में उन्होंने सोशल मीडिया का कारगर इस्तेमाल किया। इसके ज़रिए स्थानीय आबादी में जागरूकता लाई गई। फिर उन्हें गोलबंद किया गया। इस बात ने सहज ही ध्यान खींचा कि रविवार को जब मनावर में ‘आदिवासी महापंचायत’ का आयोजन हुआ, तो उसमें जुटे हजारों लोगों में लगभग एक चौथाई महिलाएं थीं। इन नेताओं ने दूसरे राज्यों के आदिवासी संगठनों से संपर्क बनाए रखा है। इसी का नतीजा है कि ‘आदिवासी महापंचायत’को अपना समर्थन देने के लिए दस राज्यों के आदिवासी संगठनों के नुमाइंदे आए।

हालांकि तथ्य यह नहीं है, फिर यह दुर्भाग्यपूर्ण हकीकत है कि सरकारें अक्सर आदिवासी आंदोलनों को वाम चरमपंथियों द्वारा संचालित बता देती हैं। चूंकि कुछ राज्यों के कुछ आंदोलनों में ऐसे रूझान मौजूद रहे, इसलिए सत्ताधारी समूहों के लिए तमाम आदिवासी संघर्षों को इस रूप में चित्रित कर देना आसान बना रहा है। ऐसी धारणाओं को सरकारों ने उचित जनतांत्रिक आंदोलनों की मांगों को नज़रअंदाज करने और कुछ मामलों में आंदोलनों का दमन करने का बहाना बनाया है। अच्छी बात है कि मनावर के आदिवासी नेताओं ने अपने आंदोलन को ऐसी शक्ल दी है, जिसमें ऐसा करना आसान नहीं होगा। बल्कि उनकी मांगें ना सुनना असंवैधानिक गतिविधि मानी जाएगी।

इसीलिए मध्य प्रदेश सरकार के लिए यह उचित होगा कि वह इस आंदोलन की मांगों को पूरा करने के लिए तुरंत कदम उठाए। विस्थापितों के पुनर्वास एवं उन्हें मिलने वाले मुआवजे के बारे में सरकार को अपनी नीति पर पूर्ण एवं ईमादारी से अमल सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही उसे इस बारे में सफाई देनी चाहिए कि उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण क्यों किया गया? क्या ये सीमेंट फैक्टरी कहीं ऐसी जगह पर नहीं लग सकती थी, जहां न्यूनतम विस्थापन होता?

आजादी के बाद से सरकारों ने जमीन अधिग्रहण के लिए लगभग औपनिवेशिक नज़रिया अपनाए रखा। इस बारे में वैधानिक स्थिति पिछले 20-22 वर्षों में बदली है। लेकिन व्यवहार में आज भी कई जगहों पर विस्थापित परिवारों के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन होता है। मनावर में भी फिलहाल ऐसा ही होता दिख रहा है। इसीलिए वहां की आदिवासी आबादी की लड़ाई को पूरा समर्थन दिए जाने की ज़रूरत है। आंदोलन को संवैधानिक दायरे में रखने और आम-जन को संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूक करने के यहां हो रहे प्रयोग दूरगामी महत्त्व के हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों के जन-संघर्षों के लिए भी मार्ग-दर्शक बन सकते हैं।