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  • May. 22, 2018

पहली योजना की आश्चर्यजनक सफलता के बाद योजना आयोग ने अपना ध्यान कृषि के साथ साथ उद्योग के विस्तार पर भी केंद्रित करने का निर्णय लिया। माना गया कि कृषि के मामले में पहली योजना में उम्मीद से बहुत ज्यादा हासिल हो ही चुका है, सो अब औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी पर क्यों न ज़ोर लगाया जाए। सन् 1956 से 1961 के लिए बनी दूसरी योजना में कुल खर्च का करीब 20 फीसदी ही कृषि और सिंचाई के लिए दिया गया। वैसे यह रकम पहली योजना में सिर्फ कृषि पर खर्च की गई रकम से फिर भी ज्यादा थी। लेकिन उद्योग को मिले धन की तुलना में कम थी। दूसरी योजना में 4,800 करोड़ में से 1050 करोड़ कृषि को दिए गए। इसी दौरान कृषि शिक्षा को बढ़ाने का इरादा बना। पंत नगर में कृषि विश्वविद्यालय खड़ा किया गया। वैश्विक स्तर पर सुझाव दिया जा रहा था कि भारत में यह कदम कृषि के अलावा पशु पालन, पशु चिकित्सा और डेयरी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसी दौरान विनियमित कृषि बाजारों की संख्या बढ़ाने का काम चालू कर दिया गया था। इन कृषि बाजारों की संख्या पहली योजना के आखिर में जहां 470 थी, वहीं दूसरी योजना के आखिर तक इसे 725 तक पहुंचा दिया गया। यानी कृषि उत्पाद के विपणन के महत्त्व को देश के पूर्व नियोजकों ने भी समझ लिया था।

लक्ष्य बहुत बड़े बना लिए गए

इन सब कदमों का असर होने की उम्मीद लगाते हुए और पहली योजना में लक्ष्य से ज्यादा हासिल होने को ध्यान में रखते हुए दूसरी योजना में कृषि उत्पादन के काफी बड़े और कुछ ज्यादा ही महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर लिए गए। सोचा गया था की ये नए लक्ष्य पिछली योजना में इस्तेमाल हुई रणनीति और उपायों को दोहरा कर पूरे कर लिए जाएंगे। लेकिन दूसरी योजना के लक्ष्य जितने बड़े बना लिए गए थे, वे उस हिसाब से हासिल नहीं हो पाए। हालांकि दूसरी योजना के जो नतीजे आए, वे पहली योजना के मुकाबले अच्छे ही थे। लेकिन घोषित लक्ष्य से कम रह गए। मसलन, दूसरी योजना में करीब दो करोड़ 10 लाख एकड़ जमीन तक सिंचाई को पहुंचाने का भारी भरकम लक्ष्य था, जिसमें से एक करोड़ 60 लाख एकड़ जमीन तक ही सिंचाई पहुंच पाई। इसी तरह लक्ष्य की अतिशयता के कारण अनाज का उत्पादन भी घोषित लक्ष्य से कम हुआ। खाद की खपत छह लाख टन से बढाकर 18 लाख टन कर लेने और 93 हजार एकड़ जमीन पर तीन हजार सीड मल्टीप्लिकेशन फार्म बनाने का इरादा इसी योजना में था। इसी तरह साढ़े तीन हजार टयूबवेल लगाने का लक्ष्य था।

लेकिन जिन उपायों के जरिए उत्पादन बढ़ने की आस लगाई गई थी, वे उतने आगे नहीं बढ़ पाए। मसलन, नाइट्रोजीनस और फॉस्फेटिक खाद की खपत अनुमानित रफ्तार से नहीं बढ़ पाई। अंसिचित जमीन को सिंचित में तब्दील करने की रफतार बढ़ी जरूर लेकिन उतनी नहीं बढ़ी जितना सोचा गया था।

हालांकि यह भी गौरतलब है कि दूसरी योजना के शुरुआती वर्ष की तुलना में अंतिम वर्ष में कृषि उत्पादन काफी बढ़ा। लक्ष्य 8 करोड़ पांच लाख टन अनाज के उत्पादन का था। जबकि 7 लाख 97 लाख टन उत्पादन हुआ। हालांकि इसी दौरान देश में कई फसलों की कमी हो गई। वैसे गन्ना, चाय जैसी कुछ फसलों के नतीजे अच्छे आए थे।

फोटो साभार : द ट्रिब्यून

कृषि उत्पादन में कमी से महंगाई ने फिर घेरा

कृषि क्षेत्र में ऐसे प्रदर्शन से कई चुनौतियां भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने आकर खड़ी हो गईं। इनमें सबसे बड़ी मुश्किल थी कीमतों का फिर बढ़ जाना। खाद्यान्न मूल्य सूचकांक फिर एकदम ऊपर चला गया। महंगाई के हालात फिर पहले जैसे बनने लगे। गौरतलब है कि पहली योजना की सफलता के बाद भारत ने अनाज का आयात काफी कम कर लिया था। उससे काफी विदेशी मुद्रा की बचत हुई थी, जिसे उद्योग के विकास के लिए नई मशीनें और तकनीक की खरीद में खर्च करने की योजना थी। लेकिन दूसरी योजना के तहत कृषि में कम उत्पादन की वजह से फिर से आयात बढ़ाना पड़ा। विदेशी मुद्रा फिर कृषि में खर्च करनी पड़ी। बहरहाल, आज तक यही माना जाता है कि दूसरी योजना में कृषि का कुल प्रदर्शन लक्ष्य के मुताबिक नहीं रहा था। आज के दिग्गज विश्लेषक भी इसका कारण लक्ष्यों को कुछ ज्यादा ही बड़ा बनाने को मानते हैं।

बहरहाल, दूसरी योजना के प्रदर्शन ने नीति निर्माताओं के सामने अपनी रणनीति पर फिर विचार करने की जरूरत पैदा कर दी। तीसरी पंचवर्षीय योजना में फिर से खाद्य उत्पादन में आत्म-निर्भरता को प्राथमिक लक्ष्य बनाया जाना जरूरी बन गया था।

तीसरी पांच वर्षीय योजना (1961-66)

पिछली दो योजनाओं से नीति निर्माता अनुभव संपन्न हो चुके थे। पहली योजना में कृषि और दूसरी योजना में उद्योग पर जोर देकर उसके नफा-नुकसान देखे जा चुके थे। देश यह समझ चुका था कि कृषि क्षेत्र ही भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता में मुख्य भूमिका निभाता है। तब तक यह अनुभव सिद्ध ज्ञान मिल चुका था कि एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में अगर कृषि की स्थिति बिगडती है तो खुद-ब-खुद अर्थव्यवस्था की स्थिति भी खराब हो जाती है। तब तक यह भी सिद्ध हुआ कि उद्योग को बढ़ावा देकर अर्थ तंत्र की मजबूती संभाली तो जा सकती है, लेकिन किसी कृषि प्रधान देश में अधिसंख्य आबादी का सुख छिन जाता है। इसीलिए तीसरी योजना में एक बार फिर ज्यादा ध्यान कृषि की तरफ लाया गया। रणनीति बदली गई। उद्योग से ज्यादा महत्त्व कृषि को दिया गया।

फोटो साभार : डाउन तो अर्थ

कृषि में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य

इस योजना का मुख्य उद्देश्य खाद्य उत्पादन में आत्म-निर्भर बनना था। इसीलिए उत्पादन को अधिकतम क्षमता तक बढ़ाने की मुहिम शुरू हुई। उन पांच साल में कृषि पर 1745 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनी। कृषि के लिए कई क्रांतिकारी फैसले किए गए। कृषि को मजबूती देने के लिए कई संस्थाएं खड़ी की गईं। कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्टस एंड प्राइसेज़ बनाया गया। बाद में इस आयोग का नाम बदलकर एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन किया गया। सन् 1965 में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। इंटेंसिव एग्रीकल्चर डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम जैसे कई नए कार्यक्रम भी इसी दौरान शुरू हुए।

आपदाओं ने संकट में डाला

लेकिन तीसरी योजना का यह कालखंड अप्रत्याशित आपदाओं और दुर्घटनाओं का शिकार हो गया। इसी कालखंड में देश में अपूर्व प्राकृतिक विपदाएं आन पड़ीं। इसी दौरान पड़ोसियों के हमलों से सन् 1962 में चीन से और 1965 में पाकिस्तान से युद्ध लड़ना पड़ा। इन आपदाओं से तीसरी योजना के जो लक्ष्य बनाए गए थे, वे लक्ष्य गड़बड़ा गए। एक और विपदा 1964 में पंडित नेहरू का देहावसान भी रहा। इसे भी पंचवर्षीय योजनाओं पर एक संकट के रूप में देखा जाता है। उनके देहांत के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। लेकिन उन्हें देश में भयावह सूखे और पाकिस्तान से युद्ध से जूझना पड़ा। इन आपदाओं के असर से तीसरी योजना खुद को बचा नहीं पाई।

सन् 65 के सूखे ने रुला दिया

हालांकि पहले चार सालों में 8 करोड़ 90 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ था, जो कृषि का एक रिकॉर्ड उत्पादन था। लेकिन पांचवें साल यानी 1965-66 में भयावह सूखे के कारण अनाज उत्पादन एकदम नीचे आ गया। इन पांच साल में हमारा औसत उत्पादन 7 करोड़ 20 लाख टन ही बैठा। कुल मिलाकर जो बड़ा लक्ष्य बनाकर रखा गया था, वह हासिल नहीं हो पाया। सूखे ने कृषि की कमर तोड़ दी। देश एकदम से अनाज के संकट में घिर गया। अचानक महंगाई भी बढ़ गई। अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मच गई। हमें अपनी अनाज की मांग को पूरी करने के लिए 1966 में एक करोड़ टन अनाज विदेशों से खरीदना पड़ा। उसके अगले साल एक करोड़ 20 लाख टन अनाज का आयात किया गया। इससे हमारे विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति और गंभीर हो गई। तीसरी योजना की अगर एक वाक्य में समीक्षा करें, तो यह योजना अप्रत्याशित हादसों की शिकार हो गई।

तीसरी योजना के दौरान हुई आपदाओं के कारण देश की स्थिति पांच साल के लंबे लक्ष्य बनाने की नहीं रह गई थी। फैसला किया गया कि हालात सुधरने तक पांच साल की बजाए एक-एक साल की सालाना योजनाएं बनाई जाएं और जरूरत के मुताबिक तदर्थ फैसले किए जाएं। इसीलिए चौथी पंचवर्षीय योजना तीन साल स्थगित रही। सन् 1966 के बाद 1969 तक वार्षिक योजनाएं बनीं। इन सालाना योजनाओं में भी सारा ध्यान कृषि को उबारने पर ही लगा। ये तीन साल भारतीय कृषि के लिए मील का पत्थर साबित हुए। हरित क्रांति की रचना इसी दौर की उपज है।