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  • May. 16, 2018

ग्रामीण विकास के विभिन्न पक्षों- जैसे कृषि, गैर-कृषि रोजगार, पर्यावरण की रक्षा और समाज-सुधार आदि पर अलग-अलग विचार होता रहा है। यह अपने में उपयोगी हो सकता है, पर इससे समग्र नियोजन में कठिनाई भी आती है। इसलिए कि ये सभी पक्ष नजदीकी तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सभी मुद्दों को हम एक साथ लेकर यदि कोई समग्र योजना बनाएं, तो वह अधिक असरदार होगी। इससे यह भी समझने में मदद मिलेगी कि विभिन्न क्षेत्रों में जो सुधार चाहिए, उनमें निरंतरता और एकता कहां तक है और उन्हें जोड़ने वाले सूत्र कहां हैं?

सबसे पहले हम पर्यावरण की बात करें, क्योंकि पर्यावरण रक्षा की सफलता पर ही अन्य क्षेत्रों की सफलता आधारित है। जल संरक्षण, वर्षा के पानी को बचा कर रखना, नमी का संरक्षण और इस पर आधारित स्थानीय प्रजातियों की हरियाली को बढ़ाना, वृक्षों को पनपाना- ये सभी बहुत जरूरी कार्य हैं। इन सब कार्यों में स्थानीय स्तर पर प्रकृति को भली-भांति समझना चाहिए। इसके लिए परंपरागत ज्ञान- बुजुर्गों का ज्ञान बहुत जरूरी है, क्योंकि अनेक शताब्दियों से उन्होंने प्रकृति को समझने के प्रयास किए और इस समझ के अनुसार जीना सीखा। वनों में जिस तरह विभिन्न प्रजातियों का मिश्रण होता था, उसे बनाए रखना चाहिए। कुछ नई चुनौतियां भी हैं। चरागाहों के लिए भूमि पहले से बहुत कम बची है। अतः चारे के अनुकूल स्थानीय प्रजातियों के पेड़-पौधों को पहले से अधिक पनपाना चाहिए। जल-संग्रहण से और चारा, खाद्य, छाया, औषधि, मिट्टी एवं जल-संरक्षण देने वाले पेड़-पौधों से गांव में टिकाऊ विकास की बुनियाद तैयार होती है। जल-संरक्षण, हरियाली बढ़ाने के कार्यों से मौजूदा मनरेगा और वन-रक्षा की योजनाओं को जोड़ना चाहिए।

दूसरा बड़ा मुद्दा है सामाजिक एकता और सद्भावना। यहां हमें परंपरा के कुछ पक्षों को अपनाना है, तो कुछ को पूरी तरह त्यागना भी है। यदि परंपरा में जाति के आधार पर छुआछूत है या धर्म के आधार पर भेदभाव है, तो उसे पूरी तरह छोड़ना होगा। सामाजिक स्तर पर, जाति एवं धर्म के आधार पर, सभी की समानता को खुले दिल से मान्यता देना जरूरी है।

इसके साथ अनेक अन्य समाज-सुधार के मुद्दे जुड़े हैं। हर तरह के नशे को पूरी तरह समाप्त करना है या न्यूनतम करना है। शराब के ठेकों को गांव की सीमा से हटाना है। दहेज-प्रथा और ब्याह-शादी एवं अन्य अवसरों के अनावश्यक खर्चों को न्यूनतम करना है। गांव समुदाय के सहयोग और आशीर्वाद से कोई भी विवाह बीस हजार रुपए तक के खर्च में हो जाए, यह प्रयास होना चाहिए। जिसके पास यह राशि भी न हो, उसे भी कर्ज ना लेना पड़े, इसकी व्यवस्था पंचायत करे। आपसी झगड़ों में पुलिस और अदालत पर कोई अनावश्यक खर्च न हो तथा विभिन्न झगड़ों का पहला निपटारा ग्राम पंचायत के स्तर पर हो जाए या सुलह-समझौते से हो जाए, यह प्रयास होना चाहिए। भ्रष्टाचार को गांव के विकास कार्यों से हटाने पर व्यापक एकता बननी चाहिए। लिंग आधारित भेदभाव नहीं होना चाहिए। दरअसल, महिलाओं को आगे आने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए।

Photo : यूथ की आवाज़

गांव में विविधता भरे रोजगार होने चाहिए। केवल कृषि पर गांव की अर्थव्यवस्था निर्भर न हो। इसके लिए एक ओर तो अनेक कुटीर उद्योगों में वृद्धि होनी चाहिए, जैसे खादी वस्त्र उद्योग, जूता उद्योग, स्थानीय दस्तकारियां और हुनर आदि तथा दूसरी ओर आधुनिक प्रदूषण-विहीन या कम प्रदूषण वाले उद्योग जो गांव की जरुरतों से जुड़े हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।

एक सिद्धांत यह है कि जिन दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति स्थानीय उद्योग और उद्यम से हो सकती है, उसके लिए बहुत दूर का साज-सामान न मंगाया जाए। गांधीजी की स्वदेशी सोच इस आर्थिक सिद्धांत से जुड़ी थी। यदि इसे हम अपना लें तो गांव-कस्बे और छोटे शहर के स्तर पर बहुत से रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। पर्यावरण रक्षा में, वनीकरण में, मिट्टी एवं जल संरक्षण में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होना चाहिए। केवल वृक्षारोपण में नहीं, वृक्षों की देखभाल में, वनों की रक्षा में अधिक टिकाऊ और नियमित रोजगार का सृजन होना चाहिए।

आधुनिक, नए उभरते हुए उद्योगों में, विशेषकर सूचना तकनीक में रोजगार के अनेक नए अवसर मिल सकते हैं। शाश्वत ऊर्जा स्रोत का क्षेत्र ऐसा उभरता हुआ आधुनिक क्षेत्र है, जिसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, सूक्ष्म (माईक्रो) जल-विद्युत, मंगल टरबाईन आदि के माध्यम से ग्रामीण ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं। साथ में बहुत रोजगार सृजन भी हो सकता है, पर्यावरण रक्षा भी हो सकती है।

कृषि क्षेत्र में मुख्य जरूरत है कि छोटे किसानों के अनुरूप बहुत सस्ती तकनीक हो, आत्म-निर्भरता बढ़ाने वाली स्थानीय संसाधनों पर आधारित तकनीक हो, पर्यावरण की रक्षा वाली तकनीक हो, स्थानीय मिट्टी और जल उपलब्धि के अनुकूल तकनीक हो। इन सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए आर्गेनिक खेती को अपनाना चाहिए। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं पर निर्भरता समाप्त होनी चाहिए। महंगे और गैर-जरूरी, कर्ज बढ़ाने वाले, रोजगार छीनने वाले मशनीकरण से बचना चाहिए। जहां तक संभव हो उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण अन्य कार्यों के लिए नहीं होना चाहिए। स्थानीय बीजों को अपनाना चाहिए और उन पर आधारित जैव-विविधता को बढाना चाहिए।

भूमिहीनों को कुछ न कुछ भूमि देने का भरपूर प्रयास होना चाहिए। गांव के हर परिवार को समुचित आवास भूमि के साथ कम से कम एक एकड़ कृषि भूमि देने का प्रयास पूरी ईमानदारी व निष्ठा से होना चाहिए। आवंटित भूमि पर खेती ठीक से हो सके इसके लिए जरूरी सहायता भी मिलनी चाहिए। जहां पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक हो वहां विविध तरह के मिश्रित फलों व लघु वन उपज के बगीचों से भी टिकाऊ आजीविका प्राप्त की जानी चाहिए।

इस समग्र विकास की समझ के अनुसार ग्राम योजना बननी चाहिए। इसकी जरूरतों के अनुसार विभिन्न सरकारी स्कीमें बननी चाहिए व उनकी जिम्मेदारी, लक्ष्य आदि निर्धारित होने चाहिए। इन सभी कार्यों में महिलाओं व कमजोर वर्गों को समता आधारित भागेदारी मिलनी चाहिए।