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  • May. 04, 2018

सूचना का अधिकार (RTI) कानून-2005 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर समझा गया था। इसके ज़रिए भ्रष्टाचार और सरकारी कोताही के ख़िलाफ़ आम जन के हाथ में ऐसा हथियार आया, जिसका असर सत्ता के शिखर से लेकर ज़मीन तक पर नज़र आया। तब आम तज़ुर्बा है कि लापरवाही और मनमाने ढंग से काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के मन में इसकी वजह से एक वाज़िब डर बैठा। सत्ता के केंद्रों पर अंकुश बढ़े, उनकी जवाबदेही में इज़ाफ़ा हो- यह लोकतंत्र का बुनियादी तकाज़ा है। इसीलिए आम नागरिक और निरंकुश सत्ताएं अक्सर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं।

आरटीआई क़ानून का बनना नागरिकों में अपने हक़ को लेकर आई जागरूकता और उनकी लंबी लड़ाई का परिणाम था। मगर जब सत्ताधारी राष्ट्रीय और राजनीतिक चर्चा को मूलभूत नागरिक अधिकारों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दों से भटकाने में क़ामयाब हो जाएं, तो उसकी पहली मार लंबे संघर्षों से हासिल ऐसी उपलब्धियों पर ही पड़ती है। यही आज आरटीआई के मामले में हो रहा है। यह बिल्कुल सच है कि आरटीआई क़ानून को कमज़ोर करने की कोशिश यूपीए-2 के शासनकाल में भी हुई थी। लेकिन तब राष्ट्रीय चर्चाएं असली मुद्दों पर केंद्रित थीं और पूर्व सरकार एक हद के आगे जाकर लोकलाज के प्रति बेपरवाह नहीं होती थी। इसलिए तब वे प्रयास विफल हो गए।

मगर पिछले चार साल में हालात बदल चुके हैं। केंद्र की बीजेपी सरकार ने ऐसा माहौल बना रखा है, जिसमें हर तरह की निरंकुशताओं को फिर से फूलने-फलने का मौका मिल रहा है। मेनस्ट्रीम मीडिया पर पूरे नियंत्रण के साथ चर्चाओं को लगातार भटकाए रखा गया है। ऐसे में आज़ादी के बाद संवैधानिक व्यवस्था की स्थापना और उसके तहत हासिल हुई कई उपलब्धियां ख़तरे में हैं। इनमें आरटीआई क़ानून भी एक है।

आरटीआई कार्यकर्ताओं की आज आम राय है कि ये क़ानून धीमी मौत का शिकार हो रहा है। कैसे? यह जानने के लिए हाल के वर्षों में इस क़ानून से संबंधित नियमों में किए गए बदलावों पर ग़ौर करना चाहिए। साथ ही, प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के इस उपाय को बेअसर के लिए सरकार ने जो तरीक़े अपनाए हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए।

अप्रैल 2017 में सरकार ने नियमों में बदलाव का एक ड्राफ़्ट सामने रखा। उसके मुताबिक़ अगर सूचना मांगने वाला व्यक्ति अपनी अर्ज़ी वापस लेना चाहे, तो उसे ऐसा करने की इज़ाजत दी जाएगी। ऐसा प्रावधान हुआ, तो उसका मतलब अर्ज़ी देने वालों को डराए-धमकाए जाने का रास्ता खोल देना होगा। जबकि पहले ही (जब ऐसा प्रावधान नहीं है) दबंगों के ख़िलाफ़ सूचना मांगने वाले कार्यकर्ता हमलों और यहां तक कि हत्या का शिकार होते रहे हैं। दूसरे बदलाव के तहत प्रस्तावित किया गया कि केंद्र और राज्य सरकारें सूचना आयुक्तों की तनख्वाह तय करेंगी। (अभी उनकी तनख्वाह निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के बराबर होती है)। स्पष्टतः इसे सूचना आयुक्तों पर सरकारों का शिकंजा सकने की कोशिश माना जाएगा।

आरटीआई क़ानून के तहत प्रावधान है कि मांगी गई सूचना 30 दिन के अंदर देना अनिवार्य है। मगर हाल के अध्ययनों से सामने आया है कि इस प्रावधान का उल्लंघन बढ़ता गया है। नतीज़तन राज्य सूचना आयोगों/कार्यालयों में अर्ज़ियों का अंबार बढ़ता जा रहा है। उधर विभिन्न सरकारी विभागों में ख़ुद सूचना जारी करने (self-discloser) के प्रावधान के उल्लंघन की दर बढ़ी है। आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि आज तकरीबन 70 फ़ीसदी अर्ज़ियां वैसी सूचनाएं पाने के लिए दाख़िल करनी पड़ रही हैं, जिन्हें संबंधित विभागों को ख़ुद जारी कर देना चाहिए था। फिर राष्ट्रीय सुरक्षा, निजता के हनन, कॉपीराइट संरक्षण आदि जैसी दलील देकर अर्ज़ियों की ठुकराने की दर बढ़ गई है। ऐसे कारणों को बताकर आज लगभग 35 प्रतिशत एप्लीकेशन ख़ारिज़ कर दिए जाते हैँ।

सूचना आयोगों में पद लंबे समय तक ख़ाली रखना और उनमें रिटायर्ड नौकरशाहों की सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति आदि ऐसे तरीक़े हैं, जिनके ज़रिए भारतीय नागरिकों के सूचना के वैधानिक अधिकार को भोथरा करने की कोशिश की गई है। ज़ाहिर है, ये तमाम रूझान अनजाने में हावी नहीं हुए हैं। बल्कि जानबूझ कर इन्हें फैलने दिया गया है। अब जबकि ऐसा माहौल बना है, तो विभिन्न राज्य सरकारें भी आरटीआई क़ानून की भावना के ख़िलाफ़ जाकर काम कर रही हैं। उनमें कुछ ग़ैर-बीजेपी सरकारें भी हैं।

इसका कुल नतीजा भारत में भ्रष्टाचार पर थोड़ा-बहुत लगे अंकुश का ख़त्म होना होगा। लोकतंत्र का मूलमंत्र जनता का अधिक-से-अधिक सशक्त होना है। आरटीआई इस लिहाज से ख़ासा कारगर साबित हो रहा था। मगर इसी बीच राजनीतिक माहौल बदल गया। अफ़सोसनाक है कि एक कथित “भ्रष्ट” सरकार को हटाने के नाम पर ऐसा वातावरण बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता की निरंकुशता अधिक मजबूत हुई। अब ये प्रवृत्ति आरटीआई जैसे जन-अधिकारों के लिए ख़तरा बन गई है। आरटीआई क़ानून के सामने पेश हुई चुनौतियों को उपरोक्त संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।