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  • Mar. 16, 2018

‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना’ का ऊंचा सपना 2018-19 के बजट के साथ बीजेपी सरकार ने देश को दिखाया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना बताया (हालांकि ऐसा कहना तथ्यों के विपरीत है)। कहा गया है कि इसके तहत सरकार देश के तकरीबन 10 करोड़ परिवारों- यानी लगभग 50 करोड़ लोगों- को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराएगी। इस तरह ‘आयुष्मान’ यानी दीर्घजीवी भारत का निर्माण होगा। सचमुच ये वादा आशाएं जगाने वाला है। लेकिन दरपेश अहम सवाल यह है कि क्या ये उम्मीदें पूरी होंगी?

सिविल सोसायटी और जन-स्वास्थ्य क्षेत्र का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ ऐसे प्रश्न योजना की घोषणा होते ही उठाने लगे थे। कुछ रोज पहले नीति आयोग ने इस योजना का खाका तैयार करने के लिए बैठक बुलाई, तो अलग-अलग राज्यों के नुमाइंदों ने भी कई खास सवाल उठाए। और अब स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी ने इसकी संभाव्यता को सवालों के घेरे में खड़ा किया है। पूरी चर्चा को ध्यान में रखें, तो प्रस्तावित योजना की कई पोलें खुलती दिखती हैं। सरकार ने इन पर सटीक जवाब पेश नहीं किया, तो मुमकिन है कि उसके इरादे पर भी संदेह खड़ा होने लगे।

संसदीय समिति ने योजना पर होने वाले खर्च, उसके लिए उपलब्ध कराए गए धन, इसके पहले चलाई गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के अनुभव, और कई राज्यों में पहले से चल रही स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से इसके अंतर्विरोध जैसे व्यावहारिक मुद्दों की चर्चा की है। मगर ज्यादा अहम यह है कि स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के जरिए लोगों की सेहत सुरक्षित करने से जुड़े नज़रिए पर भी उसने प्रश्न खड़े किए हैँ। मेडिकल इंश्योरेंस के तहत अस्पताल में भर्ती मरीज़ों के इलाज के खर्च का भुगतान संबंधित कंपनियां करती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि लोगों का ज्यादातर खर्च अस्पताल में भर्ती होने के बाद नहीं, बल्कि उसके पहले आउटडोर में दिखाने और वहां लिखी गई दवाएं खरीदने या जांच कराने पर होता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च कहा जाता है।

भारत में बुनियादी मसला है कि आउटडोर इलाज कमजोर तबकों के लोगों की पहुंच से बाहर होता गया है। वजह स्वास्थ्य सेवाओं का तेजी हुआ निजीकरण है। इसीलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों में इस पर सहमति है कि अगर आयुष्मान यानी दीर्घजीवी भारत बनाना है, तो ऐसे सरकारी अस्पतालों/क्लीनिक्स की संख्या में भारी बढ़ोतरी करनी होगी, जहां सचमुच डॉक्टर बैठते हों और स्वास्थ्य जांच की सुविधाएं हों। साथ ही दवाओं को मुफ्त या सस्ती दरों पर मुहैया कराना भी इसका ज़रूरी पहलू है।

इस सिलसिले में 14 राज्यों में हुआ एक अध्ययन महत्त्वपूर्ण है, जिससे सामने आया कि आरएसबीवाई लागू होने के बाद इनमें से आठ राज्यों में इलाज पर लोगों का आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च बढ़ा, जबकि सिर्फ में दो में घटा। फिर यह नेशनल सैंपल सर्वे से सामने आ चुका है कि आरएसबीवाई के तहत सिर्फ 57 फ़ीसदी लोगों ने खुद को रजिस्टर्ड कराया। उनमें से सिर्फ 12 प्रतिशत को अस्पताल में भर्ती होकर कराए गए इलाज के खर्च का भुगतान हुआ। ये आंकड़े मेडिकल इंश्योरेंस से जुड़े आम अनुभव के मुताबिक ही हैं।

दरअसल, कम पढ़े-लिखी आबादी वाले देश में मेडिकल बीमा के साथ कई नई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। मसलन, नीति आयोग के साथ बैठक में कुछ राज्यों ने ध्यान दिलाया कि प्राइवेट अस्पतालों में सीज़ेरियन डिलिवरी की दरें असामान्य रूप से ऊंची हैं। कारण यह है कि अक्सर वहां डॉक्टर बीमा सुरक्षा वाली महिलाओं का अनावश्यक ऑपरेशन कर डालते हैं। कई मामलों में बिना दूसरे उपचारों को आजमाए निजी अस्पतालों के डॉक्टर सर्जरी का सहारा ले लेते हैं। नतीज़ा यह हुआ है कि बीमा कंपनियां भुगतान करने में यथासंभव रुकावटें लगाती हैं। इन सबसे निपटना साधन-विहीन आबादी के लिए बेहद मुश्किल होता रहा है।

इसके अलावा इस तरफ भी जरूर ध्यान खींचा जाना चाहिए कि अभी केंद्र और राज्यों के बीच लाभार्थी तय करने की कसौटी तथा राज्यों की अपनी योजनाओं एवं प्रस्तावित योजना के बीच तालमेल बनाने के तौर-तरीकों पर भी सहमति नहीं बनी है। इसलिए निकट भविष्य में ‘आयुष्मान भारत’योजना ठोस शक्ल लेकर जमीन पर उतर पाएगी, इसकी उम्मीद कम है।

आम तजुर्बा है कि मौजूदा सरकार संसदीय समितियों की रिपोर्टों को ज्यादा अहमियत नहीं देती। राज्यों और किसी योजना के अलग-अलग हित-धारकों के साथ संवाद एवं तालमेल बनाने का उसका रिकॉर्ड भी बेहतर नहीं है। इस कारण कई समस्याएं उभरी हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार ‘आयुष्मान भारत’ के संदर्भ में अपना रुख बदलना चाहिए। उसे उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उसके इरादे पर संदेह नहीं है। मगर मेडिकल इंश्योरेंस के जरिए सबको दीर्घजीवन देने के नज़रिए, उसकी तैयारी और संसाधनों की उपलब्धता जरूर सवालों के घेरे में हैं। इन पर उसने सही जवाब सामने नहीं रखा, तो संभव है कि भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा ‘आयुष्मान भारत’ को महज जुमला मानने लगे।