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  • Apr. 12, 2018

हाथरस के रहने वाले संजय कुमार की शादी कासगंज ज़िले के निज़ामपुर गांव की शीतल से तय हुई। यूं तो 130 करोड़ की आबादी वाले देश में हज़ारों शादियां रोज़ होती हैं, लेकिन संजय की शादी एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गई, क्योंकि संजय कुमार दलित हैं। गांव में कथित ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते कि कोई कथित नीची जाति का युवक घोड़ी पर बैठ कर गांव के बीच से बारात निकाले। गांव वालों का कहना है कि संजय की बारात गांव के बीच से नहीं निकलेगी, बल्कि घर से 80 मीटर दूर तक ही जाएगी। उच्च जाति के प्रभाव के आगे पुलिस भी लाचार है। संविधान की शपथ लेकर बने अधिकारी, परंपरा का हवाला दे रहे हैं। पुलिस ने बारात का नक्शा पेश किया है, जिसके मुताबिक़ बारात गांव के बीच से नहीं जाएगी। संजय गुहार लेकर हाई कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन अदालत ने उसकी अर्ज़ी ठुकरा दी और वापस पुलिस से मदद लेने के लिए कहा है।

अगर इतना काफ़ी नहीं है तो दलितों के साथ हमारे समाज का क्या रवैया है ये जानने के लिये गुजरात के भावनगर की ये घटना देखिए- गुजरात में एक दलित युवक की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने कथित ऊंची जाति के लोगों के सामने घोड़े पर चढ़ने की हिम्मत की। 21 साल के प्रदीप राठौर को घुड़सवारी का बेहद शौक़ था। उसने कुछ महीने पहले ही एक घोड़ा खरीदा था। भावनगर के ऊंची जाति के लोगों को ये पसंद नहीं आया। पहले उसे धमकाया कि दलितों को ये हक़ नहीं कि वो घोड़े की सवारी करें। लेकिन वो फिर भी नहीं माना तो उसकी हत्या कर दी गई। मामला SC/ST Act के तहत दर्ज किया गया है।

SC/ST Act को हल्का करने का आरोप लगाते हुए लाखों दलित सड़कों पर उतरे और भारत बंद किया गया। हालांकि इस बंद की चर्चा बंद के मूल उद्देश्य को लेकर नहीं बल्कि इस दौरान हुई हिंसा को लेकर ज़्यादा हुई। लेकिन ये देखना ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आखिर क्यों इस कानून के अप्रभावी हो जाने की चिंता दलित समुदाय के लोग और क़ानून के जानकार कर रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 (SC/ST Prevention of Atrocities Act 1989) के प्रावधानों में तब्दीली की। तब्दीली के मुताबिक़ मामला दर्ज होते ही गिरफ़्तारी का प्रावधान निरस्त कर दिया है, बल्कि नये आदेश के तहत FIR दर्ज करने से पहले एक शुरूआती जांच का प्रावधान रखा गया है। अगर वो व्यक्ति सरकारी कर्मचारी है तो उस पर मामला दर्ज होने से पहले उसके Appointing authority (यानी जिस अधिकारी के दस्तखत से उसकी नियुक्ति हुई हो) से इजाज़त लेनी होगी। अगर सरकारी कर्मचारी नहीं है तो जिले के पुलिस अधीक्षक से पूर्व-आज्ञा लेनी होगी।

इसके साथ ही अदालत के ज़रिये अग्रिम ज़मानत का प्रावधान भी रख दिया गया है। सबसे अहम बात ये है कि अदालत ने ये माना कि संवैधानिक सुरक्षा कवच के तौर पर दलितों की हिफ़ाज़त करने के लिये बनाए गए इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है और उच्च जाति के लोग इसका शिकार बन रहे हैं। और यही तर्क इस फैसले का आधार भी बना।

सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार का ये केस था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया। लगता है इस मामले में कोर्ट ने अपने हिसाब से आकड़ों का चयन किया है कुछ संदिग्ध तर्कों के आधार पर इस क़ानून के महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को हल्का किया गया है। आरोप है कि सरकार ने अपनी तरफ़ से मज़बूत आंकड़ों और तर्कों को लेकर अपना पक्ष भी ठीक तरह से नहीं रखा। इस फैसले ने पूरे देश के दलितों और आदिवासियों को ख़ौफ़ और असुरक्षा ने घेर लिया है। दलितों का मानना है कि क़ानून के प्रावधानों में तब्दीली संभावित दोषी की तरफ़दारी करती है न कि पीड़ित की।

हैरानी की बात तो ये है कि SC/ST Act के लगभग तीस साल से लागू होने के बावजूद भी अगर इस क़ानून के तहत मामलों में 75 फ़ीसदी लोग बरी हो रहे हैं, तो ध्यान इस बात पर जाना चाहिए था कि हमारी पुलिस, जांच एजेंसियां और निचली अदालतों में दलित हिंसा को लेकर कितनी उदासीनता है, ना कि इस निष्कर्ष पर पहुंचना कि इस क़ानून के तहत दलित समुदाय के लोग तथाकथित ऊंची जातियों के ख़िलाफ़ दुर्भावना से ग़लत मुक़दमे दर्ज करा रहे हैं।

फ़ोटो साभार: पत्रिका

दलित समुदाय को डर है कि इन प्रावधानों के शामिल होने से, कथित ऊंची जाति के दबंग लोगों में न सिर्फ़ इस कानून का डर खत्म हो जाएगा, बल्कि जिन लोगों पर शुरुआती जांच का ज़िम्मा आएगा, उनकी निष्पक्षता भी संदिग्घ है, क्योंकि उनमें से अधिकतर दबंग समाज से आते हैं। ऐसे में इस कानून के लगभग अप्रभावी होने का भय जायज़ मालूम होता है।

2014 के लोकसभा चुनाव में दलित वोट का बड़ा भाग बीजेपी के हिस्से आया और सबसे ज्यादा दलित सांसद बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर आए। इसके बावजूद पार्टी संगठन में उच्च पदाधिकारियों में से एक भी दलित समाज का नुमाइंदा नहीं है। अब भारत-बंद के प्रभाव और व्यापकता ने बीजेपी को हिला दिया है और 2019 में उसके फिर से चुनकर आने की संभावनाओं को भी धक्का पहुंचाया है। ऐसा नहीं है कि बीजेपी नेतृत्व को दलितों के गुस्से का अंदाज़ा नहीं है। बीजेपी के कई दलित सांसद तो खुलकर अपने असंतोष का इज़हार भी कर रहे हैं।

बीजेपी ख़ेमे में 14 अप्रैल को अबेंडकर जयंती के लिए ज़ोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं, ताकि किसी तरह इस राजनीतिक नुक़सान की भरपाई की जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सांसदों से कहा है कि वो दो रातें दलित गांवों में गुज़ारें ताकि दलित समाज का विश्वास बहाल हो सके।

ये विडंबना ही है कि एक तरफ़ मोदी सरकार दलित हितों पर हमले कर रही है और दूसरी तरफ़ सिर्फ़ जयंतियां मनाकर या दलितों गांवों में समय गुज़ारकर खानापूरी करने की कोशिश भी कर रही है। न सिर्फ़ कि बीजेपी की इस क़िस्म की राजनीति दलितों के संवैधानिक और नागरिक अधिकारों को चोट पहुंचा रही है बल्कि 2019 में उसकी सियासी ज़मीन को भी सीमित कर सकती है।