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  • Apr. 19, 2018

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और प्रकारातंर में भारत सरकार को कम-से-कम कल्याण कार्यक्रमों के मामले ज़िद से बाज आना चाहिए। उन्हें उन जन संगठनों, विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात अवश्य सुननी चाहिए, जिनका ख़ास सामाजिक क्षेत्रों में काम करने का लंबा अनुभव है। जन-कल्याण के कार्यक्रमों का मक़सद अगर कमज़ोर तबकों के लोगों की भलाई है, तो किसी योजना में फ़ेर-बदल से पहले तज़ुर्बेकार लोगों और लाभार्थियों से मिले फीडबैक को नज़रअंदाज करना कतई वाज़िब नहीं हो सकता।

ताज़ा विवाद आंगनबाड़ी केंद्रों में शिशुओं और गर्भवती माताओं को मिलने वाले भोजन को लेकर उठा है। ख़बरों के मुताबिक केंद्र सरकार की योजना वहां ताज़ा पकाए गए भोजन के बजाय पैकेट-बंद खाद्य मुहैया कराने की है। सरकार का दावा है कि इससे वहां शिशुओं एवं महिलाओं को ‘फैक्टरी में तैयार उच्च ऊर्जा संपन्न एवं पोषक’ खाना मिलेगा। रोज़ी-रोटी अभियान नामक ग़ैर-सरकारी संगठन ने इसके विरोध में मेनका गांधी को पत्र लिखा है। देशभर की तक़रीबन 200 संस्थाओं/ व्यक्तियों ने इस पत्र में उठाई गई आपत्तियों का समर्थन किया है। इन एतराज़ों पर सरकार को ग़ौर करना चाहिए। बेहतर यह होगा कि आंगनबाड़ी केंद्रों में मिलने वाले भोजन में किसी प्रकार का बदलाव करने के पहले सरकार अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत करे। उनका पक्ष सुने। उनसे सहमति बनाने की कोशिश करे। यही जनतांत्रिक तरीका होगा।

वरना, लोग इन संगठनों के इस आरोप पर भरोसा करने को मजबूर होंगे कि सरकार प्राइवेट कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है। ज़ाहिर है कि पैकेट-बंद खाद्य तैयार करने और सप्लाई करने का ठेका निजी कंपनियों को मिलेगा। यह स्थानीय स्तर पर भोजन तैयार करने के बने-बनाए नेटवर्क की क़ीमत पर होगा। बहरहाल, एतराज़ सिर्फ़ इस बात को लेकर ही नहीं है। ध्यान देने की बात यह भी है कि फ़िलहाल खाना लोगों की स्थानीय पसंद एवं स्वाद के मुताबिक़ पकाया जाता है। क्या पकाया जाएगा, यह तय करने की मौजूदा परिपाटी विकेंद्रित है। इस क्रम में स्थानीय समुदायों को अहम भूमिका मिली हुई है। केंद्र सरकार अपनी योजना पर आगे बढ़ी, तो भोजन के चयन के मामले में उन समुदायों की कोई भूमिका नहीं बचेगी। तब सब कुछ नौकरशाही एवं कंपनियों के स्तर पर तय होने लगेगा। ये आशंका उचित ही है कि ये सारी प्रक्रिया भ्रष्टाचार से ग्रस्त हो सकती है।

देश के अलग-अलग हिस्सों के लोगों की खान-पान की आदतें अलग-अलग हैं। विभिन्न प्रकार के अनाज, सब्जियां आदि लोगों की इन आदतों का हिस्सा हैं। ये आदतें स्थानीय वातावरण और सामाजिक-पारिवारिक पृष्ठभूमि के बीच लंबे समय में विकसित हुई होती हैं। यही कारण है कि किसी क्षेत्र विशेष के लोगों को किसी खास तरह का भोजन करके अधिक संतोष महसूस होता है। इसे ही खाद्य विभिन्नता (food diversity) कहा जाता है। इस विभिन्नता का ख़्याल रखना तंदुरुस्ती के लिए भी ज़रूरी समझा जाता है।

आंगनबाड़ी केंद्रों में छह महीने से तीन वर्षों के शिशुओं और गर्भवती एवं दूध पिला रही माताओं को स्वस्थकर भोजन उपलब्ध कराने के मकसद से कायम किया है। इनमें ज़्यादातर ग़रीब एवं कमज़ोर वर्गों के बच्चे और महिलाएं आती हैं। विचारणीय है कि क्या प्रिजरवेटिव्स (कृत्रिम दवाओं) से युक्त, काफ़ी समय पहले तैयार खाना लाभार्थियों की सेहत के हित में होगा? सामाजिक कार्यकर्ताओं का ये सवाल वाज़िब है कि अगर स्वास्थ्य के लिए ऐसा खाना बेहतर होता है, तो आख़िर समृद्ध और मध्य वर्ग के परिवारों में गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं, नवजात शिशुओं, एवं मासूम बच्चों को यही खिलाना पसंद क्यों नहीं किया जाता? दुनिया भर में प्रिजरवेटिव्स युक्त डिब्बाबंद खाद्यों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इसीलिए आज ये धारणा आम तौर पर स्वीकार्य हो गई है कि बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए ताजा पका भोजन ही सबसे सही है। ऐसे में ग़रीब एवं कमज़ोर परिवारों के बच्चों को पैकेट-बंद भोजन देने की ज़िद का क्या औचित्य हो सकता है?

कोई नई पहल करते समय संबंधित कल्याण योजना के मुख्य उद्देश्य को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना के पीछे माताओं एवं शिशुओं को पोषण एवं सेहत के बेहतर हालात मुहैया कराना और इस प्रक्रिया में स्थानीय आबादी को भागीदार बनाना भी मकसद रहा है। फ़िलहाल, स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले अनाज/सब्जियों की खरीदारी होती है, जिससे वहां के किसानों और कारोबारियों को भी फ़ायदा पहुंचता है। इसे तंत्र को तोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसके बावजूद सरकार ऐसा करने पर आमादा रहती है, तो यही माना जाएगा कि उसके लिए कॉरपोरेट सेक्टर (बड़ी कंपनियों) के हित ही सर्वोपरि हैं।