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  • Apr. 09, 2018

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में मछुआरों और किसानों के संघर्ष का यही संदेश है कि ऐसे जन-समूह अब आसानी से अपने संसाधनों से महरूम होने को तैयार नहीं हैं। वैसे ये घटना इस बात का संकेत भी है कि सरकारों ने उन हालातों से कुछ नहीं सीखा है, जिनकी वजह से तत्कालीन यूपीए सरकार को भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता एवं उचित मुआवज़ा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन का अधिकार अधिनियम-2013 बनाना पड़ा था।

उसे ख़त्म करने की नरेंद्र मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वो क़ानून अब भी क़ायम है। यहां यह याद करना उचित होगा कि सत्ता में आने के तुरंत बाद मोदी सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून को बेअसर करने की कोशिशें शुरू की थीं। इसके लिए लगातार अध्यादेश जारी किए गए। मगर किसान संगठनों और विपक्षी दलों के ज़ोरदार संघर्ष के कारण आख़िरकार उसे कदम वापस खींचने पड़े। बहरहाल, उसने क़ानून की भावना को कमज़ोर करने का उपाय फिर भी कर दिया। क़ानून पर अमल के नियम बनाने की राज्यों को पूरी आज़ादी दे दे गई। कई राज्यों ने अपने नियमों अथवा कानूनों के जरिए 2013 के अधिनियम की भावना पर प्रहार किया।

कुल मिलाकर गुज़रे चार वर्षों में इस क़ानून की भावना के ख़िलाफ़ माहौल बनाया गया है। ऐसे ही माहौल का शिकार 2006 का वन अधिकार क़ानून भी हुआ है। नतीज़ा है कि देश भर में किसानों और वनवासियों की ज़मीनों और दूसरे समुदायों के प्राकृतिक संसाधनों के जबरन अधिग्रहण की वैसी ही कोशिशें हो रही हैं, जैसा नए भूमि अधिग्रहण क़ानून या वन अधिकार के लागू होने के पहले होता था। अथवा, इसे ऐसे कहा जा सकता है कि इन क़ानूनों के प्रावधानों एवं उनकी भावना का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।

इसकी एक मिसाल मध्य प्रदेश के धार जिले में देखने को मिली। वहां सीमेंट फैक्टरी के लिए 32 गांवों की ज़मीन के हुए अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी आंदोलन करने को मजबूर हुए हैँ। अब कन्याकुमारी का आंदोलन चर्चित हुआ है, जिसकी एक प्रमुख विशेषता किसानों और मछुआरों का साथ आना है। वो कन्याकुमारी इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के निर्माण के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे हैं। योजना के मुताबिक़ ये समुद्री बंदरगाह कोवलम और मनकुड़ी के बीच बनेगा। किसानों और मछुआरों का आरोप है कि इसे उनकी रोज़ी-रोटी की क़ीमत पर बनाया जा रहा है।

इस तरह कुछ जन-समूहों के ‘विनाश’ की क़ीमत पर ‘विकास’ का अंतर्विरोध फिर खड़ा हुआ है। 2013 का भूमि अधिग्रहण क़ानून इसी समस्या के समाधान का प्रयास था। उसकी भावना थी कि ‘विकास’ योजनाएं इस तरह बनें, जिससे उसके निर्माण के लिए अपने प्राकृतिक संसाधन देने वाले जन-समूहों को भी उसमें अपना फ़ायदा नज़र आए। ऐसा तभी संभव है, जब विस्थापन के अनुपात में उनका पुनर्वास हो और ‘विकास’ के लाभ उन्हें एवं अन्य स्थानीय आबादी को भी मिले। जनसंख्या के ऐसे हिस्सों के संसाधनों को हड़पना ऐतिहासिक तौर पर पूंजी के आदिम संचय (Primitive Accumulation of Capital) की प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। औपनिवेशिक काल में ये तरीक़ा अपने चरम बिंदु पर पहुंचा। भारत में इसकी मिसाल 1894 का भूमि अधिग्रहण क़ानून था, जिसके तहत अंग्रेजी शासन ने मनमर्ज़ी से ज़मीन अधिग्रहण की व्यवस्था की थी।

लेकिन एक आज़ाद और लोकतांत्रिक देश में, जहां शासन घोषित तौर पर जनता की तरफ़ से चलाया जाता है, वही तौर-तरीक़ा जारी रहे, यह सिरे से अस्वीकार्य होना चाहिए। हैरतअंगेज़ है कि आज़ादी के 66 साल बाद तक अंग्रेजों का बनाया भूमि अधिग्रहण क़ानून लागू रहा। मगर उससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक यह है कि उसकी जगह नया क़ानून बनने के बाद भी ज़मीन पर हालात नहीं बदले। इसकी बड़ी वजह केंद्र सरकार का उस क़ानून से भावनात्मक विरोध है। कहा जा सकता है कि भले वो उस क़ानून को बदलने में नाकाम रही, लेकिन हर व्यावहारिक रूप में उसने ऐसे इंतज़ाम कर दिए हैं, जिससे 2013 का अधिनियम बेअसर हो जाए।

जबकि उसे और तमाम राज्य सरकारों को यह समझना चाहिए कि 2013 के क़ानून का बनना किसानों, आदिवासियों, मछुआरों आदि जैसे समूहों में अपने संवैधानिक एवं मानव अधिकारों को लेकर पैदा हुई नई चेतना का परिणाम था। इन तबकों के संघर्षों के कारण तत्कालीन यूपीए सरकार एक ऐसे अधिनियम का ढांचा तैयार कर पाई, जिसमें विकास परियोजनाओं के लिए न्यायपूर्ण ढंग से भूमि अधिग्रहण संभव हो सके। कन्याकुमारी में प्रस्तावित परियोजना पर काम शुरू करने के पहले अगर 2013 के क़ानून के तहत जन-सुनवाई होती, परियोजना का विश्वसनीय सामाजिक अंकेक्षण (social audit) होता और भूमि अधिग्रहण से पहले किसानों की सहमति लेने की प्रक्रिया पूरी की जाती, तो प्रभावित समुदायों को आज आंदोलन पर नहीं उतरना पड़ता।

ग़ौरतलब है कि प्रभावित समुदायों के विरोध के कारण अनेक विकास परियोजनाएं पहले से लटकी हुई हैं। विरोध इसीलिए भड़कता है, क्योंकि ग़लत ढंग से अधिग्रहण थोपने की कोशिश होती है। ऐसे प्रयासों से देश को भारी आर्थिक नुकसान होता है, जबकि सामाजिक अशांति के हालात भी बनते हैं। मगर, इसके लिए निर्विवाद रूप से सरकारें ही जिम्मेदार हैं।