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  • May. 11, 2018

किसान संगठनों के कान इस ख़बर से खड़े हो जाने चाहिए। ख़ासकर उन्हें मध्य प्रदेश में सावधानी बरतने की ज़रूरत होगी। ख़बर एक ख़ुफिया रिपोर्ट की लीक से जुड़ी है। इसके मुताबिक ख़ुफिया एजेंसियों ने तकरीबन 110 किसान संगठनों की तरफ़ से आयोजित आंदोलन के दौरान हिंसा होने की चेतावनी सरकार को दी है।

यह ख़बर इसलिए कुछ अज़ीब है, क्योंकि साल भर से चल रहे किसान आंदोलन के दौरान किसानों की तरफ़ से कहीं हिंसा नहीं हुई। मंदसौर में भी किसानों पर फ़ायरिंग की गई थी। पिछले साल छह जून को हुई इस घटना के बारे में शुरुआत में रहस्य बनाया गया। कुछ हलकों से ये बात फैलाई गई कि किसानों के हिंसक होने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने गोली चलाई। अंततः इस घटना की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग बना। लेकिन रिटायर्ड जस्टिस जेके जैन की अध्यक्षता में बने इस आयोग की सुनवाई के दौरान रहस्य पर से परदा हट गया। खुद सीआरपीएफ़ के दो जवानों ने इसके सामने मान लिया कि गोली उन्होंने चलाई थी। इसके साथ ही किसानों की तरफ़ से हिंसा होने की बात बेबुनियाद साबित हो गई।

अपने आंदोलन के ताज़ा दौर में किसान पूरी तरह अहिंसक रहे हैं। उन्होंने विरोध जताने के लिए अपनी मेहनत से उपजाई गई फ़सल के ढेर सड़कों पर लगा देने तथा धरना-प्रदर्शन जैसे आंदोलन के परंपरागत तरीकों का सहारा लिया है। इस दौरान उन्होंने अपनी आम-सहमति वाली मांगों को ठोस रूप देने और उन्हें लागू करने का तरीका सुझाने जैसा रचनात्मक काम भी किया। मसलन, उन्होंने पूरी ऋण मुक्ति और लागत से डेढ़ गुना ज़्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित कराने के लिए खुद विधेयकों का प्रारूप तैयार किया। अब वे उन मसविदों पर राजनीतिक समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं। इसके लिए अपने समर्थन में आईं 20 से ज़्यादा पार्टियों के साथ किसान संगठन राय-मशविरा करने में जुटे हैं। कोशिश विधेयकों का ऐसा ड्राफ़्ट तैयार करने की है, जो संसदीय कसौटियों पर खरा हो।

महाराष्ट्र में अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में हज़ारों किसानों ने नासिक से मुंबई तक प्रभावशाली ‘लॉन्ग मार्च’ किया। उस दौरान किसानों के अनुशासन की चौतरफ़ा तारीफ़ हुई। यहां तक कि मुंबई में वे अपने जुलूस को रात में ले गए, ताकि परीक्षा देने जाने वाले छात्रों को कोई दिक्कत ना हो। अब दस मई से अनेक किसान संगठन गांव-गांव जाकर इन मसविदों के पक्ष में लोगों के हस्ताक्षर इकट्ठा कर रहे हैं। इन्हें हुक्मरानों को सौंपा जाएगा। ये तमाम तरीके पूरी तरह लोकतांत्रिक हैं। किसान संगठनों के किसी बयान या किसी किसान नेता के भाषण में हिंसा की धमकी नहीं दी गई है। इन तमाम मिसालों के बावजूद खुफ़िया एजेंसियों को आख़िर संभावित हिंसा के संकेत कहां से मिल गए?

ये सवाल अहम है और ये बात परेशान करने वाली है। क्या अपनी प्राथमिकताओं के कारण किसानों की मांगों को पूरा करने में खुद को अक्षम पा रही सरकारें अब किसान आंदोलन के दमन की ज़मीन तैयार कर रही हैं? गौरतलब है कि एक से दस जून तक ‘गांव बंद’ आंदोलन की किसान संगठनों की तैयारी ज़ोरदार ढंग से चल रही है। मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र तक इस आंदोलन का व्यापक असर होने की संभावना है। किसानों का इरादा शहरों के लिए होने वाली दूध, सब्जियों आदि की सप्लाई को रोक देने का है। ज़ाहिर है, इस आंदोलन से शहरी ज़िंदगी भी ख़ासी प्रभावित हो सकती है। संभवतः सत्ताधारियों को इसका अंदाज़ा होगा कि इस आंदोलन के क्या सियासी नतीजे हो सकते हैँ। इसलिए ये आशंका निराधार नहीं है कि वो किसान आंदोलन को ख़त्म कराने की हर कोशिश करें।

वादों, दिलासों और ज़मीन पर ना उतरने वाली घोषणाओं से बीते एक साल से सरकारों ने किसान आंदोलन को रोकने की कोशिश की। लेकिन अब फिर से किसान आंदोलन शुरू होने का मतलब है कि किसान संगठन उन तमाम वादों और एलानों की हक़ीक़त को समझ चुके हैं। इसे सरकारें अपने लिए एक गंभीर चुनौती मान रही हों, तो उसमें कोई हैरत नहीं है। बहरहाल, अब किसान नेताओं और संगठनों के लिए भी ये बड़ी चुनौती है कि वे अपने आंदोलन को हर हाल में अहिंसक रखें। उन्हें अब दोगुनी चौकसी बरतनी चाहिए ताकि उनके बीच से अवांछित तत्व हिंसा ना कर सकें। सरकारों को दमन का कोई मौका और तर्क ना मिले, इसे सुनिश्चित करना उनकी ही ज़िम्मेदारी है।