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  • Apr. 16, 2018

इसे वादाख़िलाफ़ी के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता। और बेशक इससे केंद्र सरकार की प्राथमिकताएं भी ज़ाहिर होती हैं। अगर नरेंद्र मोदी सरकार की ऐसी ही प्राथमिकताएं हैं, तो उसे मज़दूर-विरोधी के अलावा और क्या कहा जा सकता है? सरकार संगठित क्षेत्र के 60 लाख कर्मियों को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के दायरे में लाने के अपने इरादे से पीछे हट गई है। इस योजना को EPFO ने मंजूरी दे दी थी। अगर इस पर अमल होता, तो 60 लाख कर्मचारियों को भविष्य निधि का लाभ मिल जाता। साथ ही उन्हें पेंशन की सुविधा भी मिलती।

लेकिन केंद्रीय श्रम एवं रोज़गार मंत्री संतोष गंगवार ने ऐलान कर दिया है कि ये योजना आगे नहीं बढ़ी है और फ़िलहाल सरकार की तरफ़ से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। मगर ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि EPFO बोर्ड के अध्यक्ष केंद्रीय श्रम मंत्री हैं। इसमें श्रम मंत्रालय के बड़े अफ़सर भी शामिल रहते हैं। लाजिमी है कि पिछले साल बोर्ड ने जो फ़ैसला लिया, उसे उचित ही सरकार का निर्णय समझा गया। फ़ैसला यह था कि अनिवार्य भविष्य निधि सुविधा पाने के लिए अधिकतम तनख़्वाह की सीमा 15,000 रुपए से बढ़ाकर 21,000 रुपए कर दी जाएगी। वेतन की सीमा छह हज़ार रुपए बढ़ती, तो साठ लाख और कर्मचारी इस लाभ के दायरे में आ जाते।

इस योजना के तहत आने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद 1,000 रुपए तक हर महीने पेंशन मिलती है। ये रक़म आज कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। कर्मचारी संगठन लंबे समय इस सीमा को 3,000 रुपए करने की मांग कर रहे हैँ। उसे मानना तो दूर, अब सरकार ने इस छोटे फ़ायदे का दायरा भी बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इससे आख़िर सरकार कितनी रक़म बचाएगी?

गौरतलब है कि EPFO के सदस्य कर्मचारियों की भविष्य निधि में सरकार उनके बेसिक वेतन के सिर्फ़ 1.16 फ़ीसदी के बराबर राशि का योगदान करती है। कर्मचारी खुद अपने बेसिक वेतन के 12 प्रतिशत के बराबर इसमें जमा कराते हैं, जबकि मालिक कंपनी भी 12 फ़ीसदी रक़म उसमें डालती है। ख़ुद श्रम मंत्रालय के अधिकारियों ने मीडिया से कहा है कि अगर साठ लाख कर्मचारियों को ये फ़ायदा मिलता, तो सरकार पर तीन हज़ार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता। अब यह कितनी बड़ी रक़म है, इसका अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता है।

साफ़ है, मसला धन का नहीं, बल्कि सोच का है। मुख्य प्रश्न यह है कि सरकार और अर्थव्यवस्था आम इनसान के लिए हैं, या निवेशकों और राजकोष के हित साधना अपने-आप में उनका प्रमुख उद्देश्य है? इस वर्ष संसद में पेश बजट-पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण में ख़ुद केंद्र सरकार ने कहा था कि राष्ट्र निर्माण के लिए स्वस्थ एवं उत्पादक आबादी बने, इसके लिए मानव पूंजी में निवेश पूर्व-शर्त है। मगर हर मोर्चे पर सरकार इस पूर्व शर्त को नज़रअंदाज़ करती नज़र आती है।

फ़ोटो साभार : रॉयटर्स

इसकी एक मिसाल 15वें वित्त आयोग के लिए तय किए गए विचार-बिंदु भी हैँ। सरकार ने राज्यों के लिए आवंटन की मात्रा तय करने के लिए आयोग को जिन आधारों को अपनाने को कहा है, उनमें “लोक-लुभावन” (populist) उपायों पर नियंत्रण भी एक है। साथ ही उसे यह भी देखने कहा गया है कि किसी राज्य ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफ़र (डीबीटी) को अपनाने की दिशा में कितनी प्रगति की है। इस क्रम में “लोक-लुभावन” को परिभाषित नहीं किया गया है। ऐसे में जन-कल्याण के लिए चलाई जाने वाली हर योजना इसके दायरे में आ सकती है। क्या उपरोक्त दोनों शर्तों का यह सीधा मतलब नहीं है कि केंद्र जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों के मामले में राज्यों को हतोत्साहित करना चाहता है?

अगर ग़रीब और कमज़ोर तबक़ों के लोगों को सशक्त करने की ज़िम्मेदारी से सरकारें मुंह मोड़ेंगी तो आखिर ‘स्वस्थ एवं उत्पादक मानव पूंजी’ का निर्माण कैसे हो सकता है? दुनिया में जिन देशों ने भी मानव विकास सूचकांक पर तरक़्क़ी की है, वहां ये उपलब्धि सामाजिक क्षेत्र में बड़े निवेश, श्रमिकों को बेहतर कार्य-स्थितियां एवं पूरी आबादी को दुरुस्त सामाजिक सुरक्षाएं मुहैया कराके की हासिल की गई हैं। अपना देश इन तमाम मोर्चों पर पिछड़ा रहा है। मौजूदा सरकार के समय अफ़सोसनाक हालत ये पैदा हुई है कि पहले इन क्षेत्रों में जो भी निवेश होता था या जो भी प्रगति हो रही थी, उसे अब पलटा जा रहा है।

यह भी उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के ताज़ा यू-टर्न से संगठित क्षेत्र के कर्मचारी प्रभावित होंगे। आम तौर पर समझा जा सकता है कि सरकारें- और ख़ासकर मौजूदा सरकार- संगठित क्षेत्र और मध्य वर्ग के प्रति अधिक संवेदनशील रहती हैं। लेकिन जब ये सरकार इन तबकों के हितों का ख़्याल नहीं कर रही और उन्हें नाराज़ करने का जोख़िम उठा रही है, तो आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों और ग्रामीण आबादी का कितना ख़्याल उसके मन में रहता होगा!