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  • Apr. 05, 2018

किसान नेता बार-बार ये सवाल करते हैं कि पैसे या राजकोषीय स्थिति का सवाल सिर्फ़ तभी क्यों आता है, जब किसानों की क़र्ज़ माफ़ी की बात आती है? इस सिलसिले में अक्सर नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोगों का नाम लिया जाता है। मुमकिन है कि बहुत-से लोगों को ऐसी बातें नारेबाज़ी का हिस्सा लगती हों। लेकिन अगर ख़ुद सरकारी आंकड़ों पर ग़ौर करें, तो इनका एक संदर्भ नज़र आएगा। पहले भारतीय रिजर्व बैंक के ताज़ा आंकड़ों पर ध्यान दें। इनके मुताबिक़ 2017 में कृषि क्षेत्र के बैड लोन (यानी जिस कर्ज़ के लौटाए जाने की संभावना ना हो) में 11,400 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई। यह 60,000 करोड़ रुपए से ज़्यादा हो गया। 2016 की तुलना में ये इजाफ़ा 23 फ़ीसदी था।

अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखें। हाल में सरकार ने संसद में बताया कि सभी अनुसूचित कॉमर्शियल बैंकों का बैड लोन दिसंबर 2017 तक 8 लाख 85 हज़ार करोड़ रुपए तक पहुंच गया। इनमें से 21 सरकारी बैंकों ने 2 लाख 72 हज़ार करोड़ रुपए का ऋण माफ़ कर दिया था। अगर यह माना जाए कि कुल बैड लोन में कृषि क्षेत्र का हिस्सा भी शामिल है, तो उसमें उद्योग क्षेत्र का हिस्सा 8 लाख 20 हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा होगा। इसमें भी लघु एवं मध्यम उद्यमों का हिस्सा महज 82,756 करोड़ रुपए था। यानी माफ़ी का असली फ़ायदा बड़ी-बड़ी कंपनियों को मिला।

इस सिलसिले में दो और आंकड़े अहम हैं। केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद से कृषि क्षेत्र के बैड लोन में 142.74 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। जबकि सिर्फ़ 2015-16 और 2017-18 में सरकारी बैंकों के कुल बैड लोन में 182 फ़ीसदी और प्राइवेट बैंकों के बैड लोन में 234 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ। रिजर्व बैंक के मुताबिक़ कॉरपोरेट कर्ज़दारों में 20.83 प्रतिशत डिफॉल्टर (जिन्होंने ऋण नहीं चुकाया) हो गए हैं, जबकि महज़ 6 फ़ीसदी किसानों ने ऐसा किया है।

यह याद रखने की बात है कि 2014-15 और 2016-17 में देश के कई इलाक़ों में मानसून ख़राब रहा। ओलावृष्टि की मार भी किसानों पर पड़ी। इससे खेती का संकट बढ़ा। उस हाल में किसानों के बीच क़र्ज़ ना चुकाने वालों की संख्या बढ़ी, तो इसे समझा जा सकता है। बेशक गुज़रे वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र की हालत भी अच्छी नहीं रही है। विभिन्न कारणों से मांग कमज़ोर रही, उसका असर कंपनियों के उत्पादन पर पड़ा और उनका मुनाफ़ा घटा। ऐसे में कॉरपोरेट सेक्टर में भी बैड लोन का बढ़ना एक हद तक समझा जा सकता है। लेकिन दोनों क्षेत्रों के बैड लोन की मात्रा के अंतर पर गौर करें और दोनों के प्रति सरकारों के नज़रिए पर ध्यान दें, तो उसमें जो फ़र्क़ नज़र आता है, उसे समझना कठिन है।

गौरतलब है कि पिछले साल जब कई राज्यों में किसान क़र्ज़ माफ़ी का एलान हुआ, तो भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने बैंकों का संकट और मुद्रास्फ़ीति और बढ़ने की सार्वजनिक चेतावनी दी थी। केंद्रीय वित्त मंत्री ने इसमें राज्यों की कोई सहायता करने से इनकार किया था। अरुण जेटली ने कहा कि जो राज्य ऐसा करना चाहते हैं, वो अपने खजाने से करें। मेनस्ट्रीम मीडिया कभी-कभार होने वाले ऐसे सरकारी फ़ैसलों को सस्ती जनप्रियता जुटाने की कोशिश और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बताता है। मगर जब बात कॉरपोरेट सेक्टर की आती है, तो प्रतिक्रियाएं बिल्कुल बदल जाती हैं।

सरकार ने इसी हफ़्ते राज्य सभा में बताया कि सरकारी बैंकों ने 9,063 ऐसे क़र्ज़दारों की पहचान कर ली है, जो जानबूझ कर ऋण नहीं चुका रहे हैँ। उनके ऊपर 1,10,050 करोड़ रुपए का क़र्ज़ है। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि सरकार ऐसे लोगों के नाम भी सार्वजनिक नहीं कर रही है? इसके पहले तमाम कॉरपोरेट क़र्ज़दारों के नाम जारी करने से वह इनकार कर चुकी है। आखिर जिन करदाताओं के पैसे से क़र्ज़ दिए गए, उन्हें यह जानने का हक़ क्यों नहीं है कि किस पर कितना क़र्ज़ है, कौन ऋण नहीं लौटा रहा और किनके क़र्ज़ को बैंकों ने अपने बही-खाते से हटा दिया है?

क्या बैंक या सरकार ऐसी मेहरबानी कृषि क्षेत्र पर दिखाते हैं? फिर इस बात को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब बात सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए धन बढ़ाने की आती है, तो अक्सर सरकार संसाधनों की कमी का बहाना बनाती है। दस राज्यो में इस वर्ष मनरेगा की मज़दूरी में एक भी पैसे की बढ़ोतरी नहीं की गई है। जबकि कॉरपोरेट सेक्टर को प्रोत्साहन के नाम पर हर साल लाखों रुपए की टैक्स रियायत दी जाती है, जबकि वह न्यूनतम स्थायी रोज़गार ही पैदा कर रहा है। क़र्ज़ ना चुकाने वाली बड़ी कंपनियों पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती। इस संदर्भ को ध्यान में रखें, तो क्या किसान नेताओं का उपरोक्त सवाल उचित नहीं माना जाएगा? इस पृष्ठभूमि में किसानों को पूरी ऋण मुक्ति वंचित रखने का क्या वैध तर्क आखिर सरकारों के पास है?