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  • Mar. 26, 2018

किसी रोग के इलाज का पहला कदम है- उसका निदान। इसमें शामिल है कि रोग की सही पहचान हो और साथ ही मरीज के उसके पीड़ित होने के कारणों को भी समझा जाए। फिर बारी वाज़िब दवा या सर्जरी तय करने की आती है। यह अच्छी बात है कि नीति आयोग ने अब मान लिया है कि कृषि संकट एक “वास्तविक” समस्या है, और ये मसला सरकार एवं नीति-निर्माताओं को परेशान कर रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने स्वीकार किया कि ये समस्या ‘अत्यंत जटिल’ है। इसके विस्तार में जाते हुए कहा- ‘हमारे अड़तीस फ़ीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं.. और छह करोड़ टन अनाज कहीं भंडारों में रखा हुआ है… जबकि किसान (उचित मूल्य के अभाव में) अपनी उपज को फेंक रहे हैं।’

इस बेलाग बयानी के लिए राजीव कुमार की तारीफ़ की जानी चाहिए। बहरहाल, उनका ये दावा विवादास्पद है कि ‘नीति आयोग और सरकार ने आखिरकार फ़ैसला किया है कि अब वो समय आ गया है जब हम सिर्फ़ और सिर्फ़ किसानों एवं उनकी बदहाली पर ध्यान केंद्रित करें।’ ये विवादास्पद इसलिए है, क्योंकि इस बात के कोई संकेत नज़र नहीं आते। मुद्दा है कि अगर सरकार ने सचमुच यह “फ़ैसला” कर लिया है, तो आखिर उसने हालात सुधारने के लिए कदम क्या उठाए हैं? और जो उपाय किए गए, उनका ज़मीन पर असर क्या हुआ है?

बेशक, पिछले कुछ महीनों से केंद्र और राज्य सरकारों ने किसानों के लिए घोषणाओं की झड़ी लगाई हुई है। मगर इनमें से कुछ तो सीधे तौर पर भ्रामक हैं, जबकि कुछ ज़्यादातर मामलों में बेअसर हैं। मसलन, पिछले केंद्रीय बजट में किसानों को लागत से डेढ़ गुना अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने की हुई घोषणा को भ्रामक कहा जा सकता है, जबकि कृषि पैदावार के लिए राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक मार्केट बनाने और मध्य प्रदेश में लागू भावांतर भुगतान योजना किसानों को अपेक्षित लाभ दे पाने में नाकाम रही हैं। किसान संगठनों की प्रतिक्रिया से ज़ाहिर है कि कुछ राज्यों में घोषित कर्ज़ माफ़ी भी किसानों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।

दरअसल, यह कहने का ठोस आधार है कि लंबे समय से जारी कृषि संकट पिछले चार साल में और गंभीर हो गया, तो उसकी वजह मौजूदा सरकार की नीतियां हैं। इनमें अनाज मुद्रास्फीति को हर हाल में काबू में रखने, इस मकसद से दाम में थोड़ी बढ़ोतरी होते ही आयात की इजाजत देने, कृषि उत्पादों का निर्यात हतोत्साहित करने आदि जैसी प्रवृत्तियां शामिल हैं। टीकाकारों ने उचित ही कहा है कि इस नीति के कारण किसानों के लिए ‘चित तुम जीते, पट मैं हारा’ वाली स्थिति बन गई है। इसके अलावा नोटबंदी, गौवंश के पशुओं की बिक्री पर रोक और डिजिटल एवं ऑनलाइन लेन-देन लागू करने के अति-उत्साह ने किसानों की बदहाली और बढ़ाई। क्या नीति आयोग और सरकार इन मोर्चों पर ज़रूरी सुधार के लिए तैयार हैं?

खेती को लाभकारी बनाने के लिहाज से एमएसपी का मुद्दा अहम है। सरकार कुल 24 फ़सलों के लिए एमएसपी घोषित करती है। मगर असल में इस सिस्टम के तहत ज़्यादातर गेहूं और चावल की खरीदारी ही होती है। वह भी सभी किसानों से उनकी पूरी उपज की नहीं। हाल में आलू, टमाटर, प्याज़ आदि का भाव अत्यधिक गिरने से किसान परेशान रहे हैं। इन फ़सलों को एमएसपी की सुरक्षा नहीं है। असल में अनुमान यह है कि कुल कृषि पैदावार के दस फीसदी से भी कम की खरीदारी एमएसपी पर होती है। इस बिंदु पर क्या सरकार के पास बुनियादी बदलाव की कोई योजना है?

ऐसा परिवर्तन तभी हो सकता है, जब देश की पूरी आबादी को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराना सरकार की प्राथमिकता बने। जबकि असल सूरत उलटी दिखती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को कमज़ोर किया जा रहा है और खाद्य सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के खाते में डालने की तरफ़ तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यह आम वंचित आबादी के साथ-साथ परोक्ष रूप से किसानों के हित पर भी करारा प्रहार है। ये रेखांकित करने की जरूरत है कि इस राह पर चलते हुए कुपोषण की समस्या से नहीं निपटा जा सकता, जिससे “हमारे अड़तीस फ़ीसदी बच्चे पीड़ित हैं।” ना ही यह तय किया जा सकता है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा कृषि उपज एमएसपी पर खरीदी जाएगी। ज़ाहिर है, ऐसा नहीं होगा तो किसानों का असंतोष बढ़ेगा और वे आंदोलन करने पर मज़बूर होते रहेंगे।

राजीव कुमार की टिप्पणियों से साफ है कि किसान आंदोलनों ने सरकार (और सियासी दलों) की नींद उड़ाई है। नतीजतन, सरकार कुछ ऐसा करते दिखना चाहती है, जिससे किसानों की नाराज़गी दूर हो। मगर कुछ करते दिखना भर काफ़ी नहीं है। बल्कि उसे सचमुच कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे लोगों में भरोसा हो कि उसने अपनी नीति और प्राथमिकताओं को बदला है। वरना, खुद को किसानों का हितैषी दिखाने की कोशिशें काफ़ी नहीं होंगी, भले ऐसा प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में हो या नीति आयोग के वक्तव्यों में।