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  • Apr. 25, 2018

पहले केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण मंत्रालय ने ‘दलित’ शब्द से गुरेज करने को कहा, और अब यही कदम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उठाया है। केंद्रीय मंत्रालय ने सभी सरकारी विभागों और राज्यों को ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल से बचने के लिए जो पत्र लिखा, उसका आधार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक फ़ैसले को बनाया गया। कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जातियों के लिए ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल से बचा जाए। सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इस तरफ़ भी ध्यान खींचा कि संविधान में ‘दलित’ शब्द का उपयोग नहीं किया गया है।

आरएसएस ने भी संविधान का हवाला दिया है। साथ ही यह भी जोड़ा है कि ‘दलित’ शब्द एक औपनिवेशक अवशेष है। ये शब्द अपमानजनक है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने निर्णय एक व्यक्ति की याचिका पर दिया, जिसमें ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल रोकने की अपील की गई थी। अहम सवाल है कि अब अचानक ‘दलित’ शब्द को लेकर क्यों एतराज़ होने लगा है?

दलित शब्द का उपयोग खुद पिछले लगभग तीन-चार दशकों में ‘हरिजन’ शब्द की जगह प्रचलन में आया है। ऐसा दलित समुदाय के लोगों की आपत्ति और प्राथमिकता की वजह से हुआ। हरिजन शब्द का इस्तेमाल गांधीजी ने शुरू किया था। उनकी मंशा उन जातियों को सम्मान देने की थी, जिन्हें जाति-व्यवस्था के तहत सदियों से मानवीय गरिमा से वंचित रखा गया। महात्मा गांधी ने यह संदेश देने के लिए ये शब्द चलाया कि तब “अछूत” कहे जाने वाले लोग भी सबकी तरह “ईश्वर की समान संतान” हैं। लेकिन बाद में इन समुदायों को लोगों को लगा कि इसमें कृपा की भावना है। जबकि उन्हें कृपा की नहीं, बल्कि अधिकार की ज़रूरत है।

इसलिए इस समुदायों के जागरूक तबकों ने अपने लिए दलित शब्द का इस्तेमाल शुरू किया। तब से ये माना गया है कि इस शब्द से इस समुदाय के साथ इतिहास में हुए दमन और शोषण को स्वीकृति मिलती है। तार्किक तौर पर इन ज़्यादतियों से मुक्ति की उनकी वैध आकांक्षा को भी इससे मान्यता मिलती है।

यह समझना कठिन है कि ये शब्द औपनिवेशिक अवशेष कैसे हो सकता है? ब्रिटिश राज में ये शब्द प्रचलित नहीं था। उस समय “अछूत” शब्द ही प्रचलन में था, जिसकी जगह राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में ‘हरिजन’ शब्द चलाया गया। बहरहाल, अगर आरएसएस की विचारधारा पर गौर करें, तो यह समझा जा सकता है कि उसे इस शब्द से क्यों गुरेज है? संघ विचारक यह मनोगढ़ंत इतिहास लोगों को समझाने में लगे रहे हैं कि भारतीय समाज में जातीय या लैंगिक भेदभाव औपनिवेशक दौर में आया। आरएसएस की समझ में “औपनिवेशिक काल” मुसलमानों के आने साथ शुरू होता है। उसके पहले भारत का “स्वर्ण काल” था।

ऐसी समझ फैलाते हुए संघ परिवार अब हिंदू समाज के विभाजनों पर परदा डालते हुए ‘हिंदू एकता’ के अभियान में जुटा हुआ है। इसमें उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित जागरूकता से आ रही है। पिछले तीन साल में दलित आंदोलन का दायरा और सघनता बढ़ी है। इसके बीच अचानक ये मुहिम का सामने आई है, जिसमें कोशिश दलितों की पहचान को ही बदल देने की है। अनुसूचित जातियों की लिस्ट में सैकड़ों जातियों के नाम हैं। इन सबको आपस में जोड़ने वाला पहलू उन्हें मानवीय गरिमा से वंचित रखने का इतिहास और सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन का वर्तमान है। इस साझा अहसास के साथ ये जातियां अपनी एक साझा पहचान उभारने की जद्दोजहद में रही हैं। दलित शब्द ने उन्हें ऐसी पहचान दी है।

जो लोग इस शब्द का प्रचलन रोकना चाहते हैं, ज़ाहिर है, वे या तो इस परिघटना (phenomenon) से नावाकिफ़ हैं, या फिर जानबूझ कर इस पहचान को मिटाना चाहते हैं। अफ़सोसनाक है कि न्यायपालिका भी कई मौकों पर आदेश देते वक्त ऐसे ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में नहीं रखती। बहरहाल, चाहे कोई सामाजिक- राजनीतिक संगठन हो, या सरकार या न्यायपालिका- उन्हें किसी समुदाय के बारे में फ़ैसला लेने से पहले संबंधित समुदाय का पक्ष ज़रूर सुनना चाहिए। आखिर लोकतंत्र का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जो व्यक्ति या समुदाय अपनी जो पहचान चाहे, उसे उसी रूप में जाना जाए। जबकि दूसरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने का मंसूबा रखने वाली विचारधाराएं अक्सर आत्म-पहचान तय करने के अधिकार से लोगों को वंचित करती हैं। वे संबंधित व्यक्ति/समुदाय की भावना की पूरी अनदेखी करते हुए अपनी तरफ़ से अपनी मनपसंद पहचान उन पर थोपती हैं। ऐसा ही फिर हो रहा है। लेकिन यह लगभग निश्चित है कि दलितों को ये कोशिश मंज़ूर नहीं होगी। वे इसे नाकाम कर देंगे।