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  • Feb. 05, 2018

वित्त मंत्री ने 2018-19 का आम बजट पेश करते हुए किसानों को उनकी “उपज लागत से डेढ़ गुना ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने” का एलान किया। उन्हें उम्मीद रही होगी कि इस घोषणा से किसानों में खुशी की लहर दौड़ जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 189 किसान संगठनों की नुमाइंदगी करने वाली अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति ने तुरंत ही इस एलान को खारिज कर दिया। वजह बजट भाषण में ही अरुण जेटली की एक दूसरी टिप्पणी थी। जेटली ने कहा कि पिछले रब्बी सीजन में सरकार लागत से डेढ़ गुना ज्यादा न्यूनतम मूल्य दे चुकी है।

इससे किसानों के मन में साफ हो गया कि ‘डेढ़ गुना’ से जेटली का जो मतलब है, वो वह नहीं है, जिसकी मांग वे कर रहे हैं। ‘डेढ़ गुना’ को लेकरतीन फॉर्मूला चर्चित रहे हैः ए-2, ए-2+एफ.एल. और सी-2.

ए-2 में बीज, खाद, कीटनाशक, बाहरी मजदूरों को हुआ भुगतान, ईंधन, और सिंचाई पर हुआ खर्च शामिल है। ए-2+एफ.एल. में ए-2 के अलावा खेती में परिवार के सदस्यों की लगी मजदूरी का अनुमानित मूल्य शामिल होगा। लेकिन किसान सी-2 से डेढ़ गुना ज्यादा एम.एस.पी. की मांग करते रहे हैं। इसमें ए-2+एफ.एल. के अलावा जमीन का किराया या अपनी जमीन पर लिए गए कर्ज पर चुकाए गए ब्याज की रकम और खेती में लगी अचल पूंजी की कीमत भी शामिल है।

किसान संगठनों के बीच इन मुद्दों पर बहस इतनी अधिक हो चुकी है, इस बारे में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं थी। नतीजतन, जागरूक संगठनों ने अपने लिए किसानों में सद्भावना पैदा करने की केंद्र सरकार की कोशिश को पल भर के लिए भी सफल नहीं होने दिया। चूंकि ऐसा नहीं हुआ, तो अब लगता है कि सरकार की तरफ अब नई गलतफहमियां भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है। इसकी एक मिसाल नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का बयान है। कुमार ने कहा है कि एम.एस.पी. सरकार उस फॉर्मूले से तय करेगी, जिसे किसान चाहते हैं। एक टेलीविजन इंटरव्यू में पूछे गए गए सवाल पर उन्होंने कहा- ‘इस बजट में वित्त मंत्री ने वादा किया है। वे अपना वादा निभाएंगे। हम लागत तय करते समय सी-2 का इस्तेमाल करेंगे।’

लेकिन बजट भाषण पढ़ते समय ये बात वित्त मंत्री के दिमाग में नहीं थी। यह इससे जाहिर है कि उन्होंने पिछले रब्बी सीजन के एम.एस.पी. का जिक्र किया, जबकि वो एम.एस.पी. सी-2 फॉर्मूले से कतई तय नहीं हुई थी। आगे अगर वे सी-2 फॉर्मूला अपनाना चाहते हैं, तो ये बात दो-टूक ढंग से उन्होंने बजट में क्यों नहीं कही? इसके लिए उन्होंने धन का प्रावधान इसी बजट में क्यों नहीं किया? वित्त मंत्री बजट पेश कर रहे थे। वे चुनाव मेनिफेस्टो जारी नहीं कर रहे थे। मेनिफेस्टो में पार्टियां वायदे करती हैं। सत्ता में आने के बाद जो करने का वो इरादा रखती हैं, उसकी चर्चा करती हैं।

बजट वादों और इरादों को पूरा करने का मौका होता है। किए गए वादों को जमीन पर उतारने के लिए जरूरी कार्य-योजना इसमें पेश की जाती है। उसके लिए जरूरी धन का प्रावधान किया जाता है। 2014 के अपने मनिफेस्टो में भारतीय जनता पार्टी ने लागत का डेढ़ गुना एम.एस.पी. देने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद अपने तीन बजट में उसने इस बात का जिक्र तक नहीं किया। इस बीच सरकार की नीतियों के कारण कृषि संकट गहराया। किसानों की हालत बिगड़ी। किसान आंदोलन पर उतरने को मजबूर हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी मांगों को ठोस रूप दिया। इसमें एम.एस.पी. से जुड़ी मांग भी है। ये सारी बातें अरुण जेटली के सामने थीं। इसके बावजूद उन्होंने बजट भाषण में बिना अतिरिक्त धन का प्रावधान किए डेढ़ गुना एम.एस.पी. का इस तरह एलान किया, जिसे वादों की श्रेणी में ही रखा जाएगा।

लाजिमी है कि इससे किसानों का असंतोष और भड़केगा। ये बात किसान नेताओं के बयानों से साफ होने लगी है। तो अब सरकारी अधिकारी नए सिरे से भ्रम पैदा कर रहे हैं। बेहतर ये होगा कि सरकार उन तमाम फसलों के लिए नए एम.एस.पी. का एलान करे। इसे तय करने में वह अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति की मदद ले सकती है। उनकी सहमति से नया एम.एस.पी. घोषित हो, तो गलतफहमी और विवाद की गुंजाइश नहीं रह जाएगी। हालांकि घोषित एम.एस.पी. सभी किसानों को कैसे मिले, इसे सुनिश्चित करने का मुद्दा तब भी कायम रहेगा। किसान संगठनों के मुताबिक अभी सिर्फ छह फीसदी किसानों को घोषित एम.एस.पी. मिल पाता है। बहरहाल, पहले कदम के तौर पर जरूरत सी-2 से डेढ़ गुना एम.एस.पी. का तुरंत एलान करने की है। सरकार ऐसा नहीं करती, तो किसान यही समझेंगे कि एक बार फिर उन्हें झूठे वादों से बहलाया जा रहा है।