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  • Feb. 22, 2018

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने किसानों से टकराव का रास्ता चुना है। नज़रिया कुछ ऐसा है कि हमने जो दिया उसे तो ले लो- उससे ज्यादा मांगने की जुर्रत ना करो। वरना, राज्य भर से अपनी मांगों को लेकर विधान सभा के सामने ‘महापड़ाव’ डालने आ रहे किसानों को जबरन रोकने और उनके नेताओं को हिरासत में लेने का कोई औचित्य नहीं था। किसान संगठनों ने उन्हीं मांगों को दोबारा सरकार के सामने रखने के लिए ‘महापड़ाव’ का कार्यक्रम बनाया, जिन पर पिछले सितंबर में राज्य सरकार राजी हुई थी। तब सीकर में 13 दिन तक चले ‘महापड़ाव’ के बाद चार सदस्यीय मंत्रिमंडलीय समिति और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बीच समझौता हुआ था। उसमें राज्य सरकार किसानों की 11 सूत्री मांगों पर विचार करने के लिए पर राजी हुई थी। इन मांगों पर गौर करने के लिए तब राज्य सरकार ने एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने का एलान किया था।

अब किसान संगठनों का आरोप है कि राज्य सरकार उनमें से ज्यादातर मांगों को मानने से मुकर गई है। मसलन, तब वह सभी किसानों की कर्ज माफ़ी पर सहमत हुई थी। लेकिन कुछ रोज पहले मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अगले वित्त वर्ष का बजट पेश करते समय सिर्फ छोटे और सीमांत किसानों को कर्ज राहत देने का एलान किया। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में किसानों पर साढ़े 49 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का ऋण है। मगर मुख्यमंत्री ने सिर्फ 20 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफ़ी की घोषणा की। इसी तरह किसान इससे भी नाराज हैं कि स्वामीनाथन फॉर्मूले के मुताबिक उनकी उपज लागत का डेढ़ गुना एम.एस.पी. देने की मांग सरकार ने नहीं मानी है। इसके बिना ही केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ये दावा कर दिया कि सरकार रब्बी फ़सल पर लागत से डेढ़ गुना ज्यादा एम.एस.पी. दे रही है और अगले सीज़न में खरीफ़ फ़सलों पर भी यह लागू हो जाएगा।

किसान इसे अपने साथ विश्वासघात मान रहे हैं। अपनी इसी भावना को जताने के लिए उन्होंने जयपुर में ‘महापड़ाव’ यानी विधान सभा के घेराव का एलान किया। इस पर लोकतांत्रिक नजरिया यह होता कि सरकार किसान नेताओं को बातचीत के लिए बुलाती। सीकर आंदोलन के समय जो सहमति हुई थी, उस पर अपना पक्ष रखती। ये बताती कि उन 11 मांगों को लागू करने में उसके सामने क्या दिक्कत है। इस पर वह किसानों का पक्ष सुनती। तर्क-वितर्क एवं चर्चा से सहमति के बिंदु तलाश करने की कोशिश वह करती। इसके बजाय किसानों नेताओं को हिरासत में लेना और किसानों को जयपुर पहुंचने से रोकने की कोशिश करना अलोकतांत्रिक सोच का संकेत है।

अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे किसानों का गुस्सा और भड़केगा। वसुंधरा राजे सरकार के साथ साख का सवाल पहले से जुड़ा रहा है। कारण उसके अनेक ऐसे कदम हैं, जिन्हें जन-विरोधी समझा गया है। किसानों के भारी विरोध के कारण केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जब भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता के लिए 2013 में बनाए गए कानून को बदलने में नाकाम रही, तो उसने इस कानून से संबंधित नियमों में फेरबदल का अधिकार राज्यों को दे दिया। उन्हें सबसे वसुंधरा राजे सरकार ने बदला। इसी तरह आरटीई कानून से लेकर श्रम कानूनों तक में उसने ऐसे बदलाव किए, जिनको लेकर जनता के विभिन्न वर्गों में असंतोष पैदा हुआ। यहां तक कि मीडिया की आजादी को नियंत्रित करने की पहल भी उसने की, जिसे जोरदार विरोध के बाद वापस लिया गया।

इसी बीच सीकर का किसान आंदोलन हुआ। उस आंदोलन में कई खास बातें दिखीं। हालांकि नेतृत्व किसानों के हाथ में था, लेकिन उसमें खेतिहर एवं दूसरे मजदूरों और व्यापारियों तक की भागीदारी देखी गई। मौजूद आपसी अंतर्विरोधों के बावजूद इन तबकों का एक आंदोलन में शामिल होना इस बात का संकेत था कि देश में संघर्ष का एक नया कथानक तैयार हो रहा है। इसे संकेत माना गया कि पूंजी, शहर एवं मध्य वर्ग हितैषी सरकारी नीतियों के खिलाफ ग्रामीण समुदायों में अपने हितों की एक साझा समझ बन रही है। नतीजतन, बढ़ती जा रही ग्रामीण बदहाली के खिलाफ ग्रामीण जन-समूह एक झंडे के नीचे आकर लड़ाई लड़ने को तैयार हो रहे हैं। सरकारों के लिए बेहतर होगा कि वे इस सूरत को समझें। इससे सही सबक एवं संकेत ग्रहण करें।

भारत में किसान आंदोलन की परंपरा पुरानी है। लेकिन आजादी के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि देश भर के किसान संगठन उतने बड़े पैमाने पर एकजुट हुए हों, जैसा अभी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के तहत हुआ है। सरकारों के लिए समझने का बिंदु यह है कि आखिर ऐसे क्या हालात बने, जिनके कारण किसान संगठन एकजुट हुए? दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी समझ और दूरंदेशी दिखाने के बजाय वसुंधरा राजे सरकार ने उलटा रास्ता चुना है। मगर किसानों में आई नव-जागरूता के बीच दमन की राह सफल होगी, इसकी संभावना कम ही है।