समाचार
  • केरल में बाढ़ से भारी तबाही
  • 500 करोड़ रुपए की अतिरिक्त सहायता का ऐलान
  • मृतकों के परिजनों को 2 लाख और घायलों को 50 हज़ार रुपये का मुआवज़ा
  • केरल सरकार ने केंद्र से मांगी थी 2000 करोड़ रुपये की मदद
  • उत्तर प्रदेश: झांसी में आवारा जानवरों से परेशान किसान
  • फसल बर्बाद होने का सदमा नहीं झेल पाया किसान
  • दिल का दौरा पड़ने से किसान ने खेत में तोड़ा दम
  • महाराष्ट्र: पुणे में किसानों ने मौसम विभाग के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई
  • मौसम विभाग पर ग़लत जानकारी देने का आरोप लगाया
  • स्वाभिमानी शेतकारी संगठन ने मौसम विभाग पर दर्ज कराया मामला
  • मध्य प्रदेश: बीना परियोजना के ख़िलाफ़ किसानों का प्रदर्शन
  • डूब प्रभावित इलाकों के किसानों का प्रदर्शन
  • किसानों ने रखी परियोजना को रद्द करने की मांग
  • हरियाणा: पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने की पहल
  • चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय को मिले चार करोड़ रुपये
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने दी आर्थिक सहायता

From The Desk

गुजरात : भूमि अधिग्रहण मामले में 355 किसानों को ज़मानत

  • May. 16, 2018
फ़ोटो स्रोत : द इंडियन एक्सप्रेस

गुजरात पुलिस ने 355 किसानों को ज़मानत दे दी है। लंबे समय से गुजरात के भावनगर के किसान गुजरात पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (जीपीसीएल) द्वारा ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे। 24 अप्रैल को जब इलाक़े के पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों ने सरकार से इच्छामृत्यु की मांग की तो मामले ने तूल पकड़ लिया। इसके बाद, 13 मई की रात गुजरात के भावनगर ज़िले में पुलिस ने 355 किसानों को गिरफ़्तार कर लिया था। जिनमें 138 महिलाएं भी शामिल थीं। पुलिस का कहना था कि किसानों का संघर्ष हिंसक होने की वजह से उन्हें किसानों को गिरफ़्तार करना पड़ा। फ़िलहाल गुजरात पुलिस ने सभी किसानों को ज़मानत दे दी है।

गुजरात पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने लगभग दो दशक पहले अपना प्रस्तावित लिग्नाइट संयंत्र स्थापित करने के लिए भावनगर में घोघा तालुक के 12 गांवों में लगभग 1,200 से ज़्यादा किसानों की 3,377 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। 1,414 हेक्टेयर ज़मीन के बदले कंपनी ने 1995 से लेकर 2005 के बीच मुआवज़ा भी दिया, लेकिन इस दौरान ज़मीन पर किसानों का कब्ज़ा बरकरार रहा। किसानों की मांग है कि इस मामले में भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 के प्रस्तावों को लागू किया जाए। किसानों की दलील है कि पूरा मामला उच्च न्यायालय में लंबित है। लिहाज़ा न्यायिक फ़ैसले से पहले पुलिस की मदद से ज़मीन पर कब्ज़ा करना बलप्रयोग है।