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संपादकीय

दायित्व से ऊपर स्वार्थ?

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  • May. 16, 2018
फोटो साभार: पीटीआइ

कावेरी जल विवाद में केंद्र की प्रस्तावित योजना से कावेरी डेल्टा के किसान असंतुष्ट हैं, तो उसकी ठोस वजहें हैं। केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने इस विवाद का जल्द-से-जल्द प्रभावी समाधान ढूंढने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बदले उसने सत्ताधारी दल के सियासी स्वार्थों को तरजीह दी। दशकों से उलझे इस विवाद में आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने पिछले फरवरी में अपना फ़ैसला सुनाया था। इसमें कावेरी के पानी में संबंधित राज्यों का हिस्सा तय किया गया। इस निर्णय पर अमल कराने के लिए एक संस्था बनाने का आदेश दिया गया। इसके ढांचे के बारे में केंद्र से योजना का मसविदा पेश करने को कहा गया। यह काम केंद्र को 31 मार्च तक करना था। लेकिन तब तक कर्नाटक विधान सभा का चुनाव सिर पर आ चुका था। केंद्र को कर्नाटक में बीजेपी के हितों की ज़्यादा चिंता थी। तो उसने टाल-मटोल का रास्ता अपनाया। लगभग डेढ़ महीने बाद उसने ये मसविदा कर्नाटक में मतगणना से एक दिन पहले जाकर सुप्रीम कोर्ट को सौंपा।

मगर इतनी देर के बावजूद भी केंद्र ने कावेरी जल प्रबंधन योजना का दुरुस्त ड्राफ़्ट नहीं सौंपा है, यह आम धारणा बनी है। बल्कि कुछ हलकों में तो इसे भ्रामक भी माना गया है। हालांकि केंद्र ने अपनी योजना का आधार कावरी जल विवाद ट्रिब्यूनल (CWDT) की सिफ़ारिशों को बनाया है, लेकिन उसने इसमें कई बदलाव भी कर दिए हैं। ट्रिब्यूनल की अनुशंसाओं और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की मूल भावना यह थी कि तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच जल बंटवारे की प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाए। ये तभी हो सकता है, जब ये काम विशेषज्ञों की स्वायत्त समिति को सौंप दिया जाए।

इसीलिए ट्रिब्यूनल ने प्रस्तावित संस्था का प्रमुख जल संसाधन क्षेत्र में कम-से-कम 20 साल का तजुर्बा रखने वाले इंजीनियर को बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन केंद्र के ड्राफ़्ट के मुताबिक केंद्र सरकार में सचिव या अतिरिक्त सचिव स्तर का कोई नौकरशाह भी इस समिति का अध्यक्ष बन सकेगा। ट्रिब्यूनल ने समिति में राज्यों के प्रतिनिधि के तौर भी इंजीनियरों को रखने की सिफ़ारिश की थी। यहां भी केंद्र की पसंद नौकरशाह बने हैं। ट्रिब्यूनल की राय थी कि प्रस्तावित समिति का निर्णय आख़िरी होना चाहिए। मगर यहां केंद्र ने प्रावधान प्रस्तावित किया है कि अगर कोई संबंधित उसके फ़ैसले से सहमत ना हो, तो समिति केंद्र से निर्देश लेगी। स्पष्टतः यहां गेंद राजनीतिक नेतृत्व के पाले में चली जाएगी। राजनीतिक नेतृत्व कैसे काम करता है, इसकी सबसे साफ मिसाल तो इस योजना का ड्राफ़्ट तैयार करने और उसे सुप्रीम कोर्ट को सौंपने के दौरान दिखा केंद्र का रुख ही है।

केंद्र के लचर रुख़ का ही उदाहरण है कि उसने प्रस्तावित समिति का नाम तक तय करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट को दे दी है। जबकि उस क्षेत्र के किसानों को उम्मीद थी कि केंद्र अब एक ऐसी ठोस योजना पेश करेगा, जिससे इस विवाद का अंत हो जाएगा। अब इस ड्राफ़्ट पर सुप्रीम कोर्ट में बहस होगी। संबंधित राज्य अपना पक्ष रखेंगे। अधिक संभावना है कि वो केंद्र के ड्राफ़्ट पर सवाल उठाएंगे। इस प्रक्रिया में विवाद और लंबा खिंचेगा।

किसानों की अपेक्षा थी कि केंद्र योजना का ड्राफ़्ट तैयार करने से पहले उनके संगठनों से राय-मशविरा करेगा। कोई सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी। इससे ऐसी प्रस्तावित संस्था के ऐसे ढांचे पर आम-सहमति बन सकती थी, जो शक्तिशाली एवं स्वतंत्र होती और अपने विवेक से जल-बंटवारा संबंधी निर्णय लेती। यह फ़ैसला मानने के लिए सभी राज्य बाध्य होते। लेकिन अब केंद्र ने ऐसी दस सदस्यीय संस्था का प्रस्ताव रखा है, जो पानी छोड़े जाने के समय राज्य सरकारों से विचार-विमर्श के बाद ही फ़ैसला ले सकेगी। इस बीच कोई राज्य सहमत नहीं हुआ, तो बात केंद्र के हाथ में चली जाएगी। इस पृष्ठभूमि में ये अंदेशा वाजिब है कि भाखड़ा-व्यास मैनेजमेंट बोर्ड या नर्मदा, कृष्णा एवं गोदावरी नदियों के जल बंटवारे के लिए बनी संस्थाओं की तरह प्रस्तावित संस्था कारगर ढंग से काम नहीं कर पाएगी।

इसीलिए कावेरी डेल्टा के किसानों में नाराज़गी पैदा हुई है। हालिया तजुर्बे से उनमें ये आशंका और गहराई है कि वर्तमान केंद्र सरकार के लिए अहम किसानों की मुश्किलें नहीं, बल्कि उसके अपने राजनीतिक स्वार्थ हैं।