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मानसून को “सामान्य” बनाए रखने के सरकारी उपाय


महाराष्ट्र का परभणी रूरल पुलिस थाना! कुछ किसान एक शिकायत दर्ज कराने पहुंचते हैं। उनका आरोप है कि मौसम विभाग के अधिकारियों ने खाद, बीज बेचने वाली कंपनियों के साथ सांठगांठ कर बारिश के अनुमान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। मानसून अच्छा रहेगा, इस भरोसे उन्होंने जोरशोर से बुवाई की। लेकिन बारिश कम रही और उन्हें लाखों का नुकसान उठाना पड़ा।

ये किसान एनडीए से नाता तोड़ चुके राजू शेट्टी के स्वाभिमान शेतकरी संगठन से जुड़े हैं। इसलिए पूरे मामले को राजनीतिक स्टंट माना जा सकता है। लेकिन पिछले साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी मौसम विभाग पर गलत पूर्वानुमान का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार से शिकायत कर चुके हैं।

तो क्या वाकई मौसम विभाग मानसून में बारिश के पूर्वानुमान को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा है? इस सवाल का जवाब मौसम विभाग के ही कुछ आंकड़ें और कई विरोधाभास दे सकते हैं।

इस साल 16 अप्रैल को जारी मानसून के पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने “सामान्य” बारिश की अधिकतम संभावना जताई थी। लेकिन चार महीनों के मानसून सीजन (जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर) के आधे रास्ते तक पहुंचते-पहुंचते इस पूर्वानुमान पर संदेह होने लगा है। जून में कई इलाकों तक मानसून पहुंचा ही नहीं और देश के सिर्फ 34 फीसदी हिस्से में बारिश सामान्य रही।

हालांकि, जुलाई में स्थिति सुधरी फिर भी 1 जून से 12 अगस्त तक देश भर में औसत से 11 फीसदी कम यानी 89 फीसदी बारिश दर्ज की गई है। जबकि मौसम विभाग ने पूरे मानसून सीजन में 97 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया था। इसमें 5 फीसदी का मॉडल मार्जिन था। इसे भी जोड़ लें तो अभी तक मानसून का प्रदर्शन अनुमान के अनुरुप नहीं दिखता।

मानसून का यह अप्रत्याशित मिजाज ही इसकी पहचान है। एक ही समय कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे के हालात रहते हैं। इसलिए मौसम का सटीक अनुमान लगाना जरूरी हो जाता है।

अब जरा उन किसानों की सोचिए जिन्होंने सामान्य मानसून की आस में खूब बुवाई कर दी लेकिन अब बादलों की बेरुखी की मार झेल रहे हैं। मराठवाडा, सौराष्ट्र, तेलंगाना, झारखंड और मध्य प्रदेश के कई इलाकों के किसान इसी पीड़ा से गुजर रहे हैं। दूसरी तरफ, केरल अप्रत्याशित बाढ़ से जूझ रहा है। डिजिटल इंडिया के दौर में मौसम के अनुमान की समूची प्रणाली सवालों के घेरे में है।  

सामान्य मानसून का हाल

ताजा स्थिति यह है कि एक जून से 12 अगस्त तक रायलसीमा में औसत से 40 फीसदी, सौराष्ट्र और कच्छ में 29 फीसदी, असम-मेघालय में 33 फीसदी, झारखंड में 27 फीसदी, और मराठवाडा में 21 फीसदी कम बरिश हुई है। देश के कुल 36 मौसमीय संभागों में से 20 संभागों में 10 फीसदी या इससे कम बारिश हुई है।

जिलेवार देखें तो देश के 659 जिलों में 243 जिलों में सामान्य से कम और 23 जिलों में बहुत कम बारिश हुई है। दूसरी तरफ, केरल में औसत से 20 फीसदी ज्यादा बारिश हो गई जिससे वहां भीषण बाढ़ के हालत हैं। इस साल सामान्य मानसून की यही हालिया तस्वीर है।

यहां सवाल यह नहीं कि मौसम विभाग का अनुमान कितना सही या गलत निकला। सवाल है कि मानसून की सही तस्वीर क्यों नहीं दिखाई जा रही है?

30 मई को जारी मानसून के दूसरे दीर्घावधि पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने उत्तर पश्चिमी भारत में 100 फीसदी, मध्य भारत में 99 फीसदी, दक्षिणी प्रायद्वीप में 95 फीसदी और पूर्वोत्तर भारत में 93 फीसदी वर्षा की संभावन बताई थी। इसमें 8 फीसदी का मॉडल एरर रखा गया। इस तरह मई के आखिर तक भी मौसम विभाग पूरे देश में मानसून के दौरान 97 फीसदी बारिश के अनुमान पर कायम था।

जबकि असलियत यह है कि 12 अगस्त तक उत्तर पश्चिमी भारत में 94 फीसदी, मध्य भारत में 93 फीसदी, दक्षिणी प्रायद्वीप में 101 फीसदी और पूर्वोत्तर भारत में सिर्फ 73 फीसदी बारिश दर्ज की गई है। इस तरह समूचे देश में औसत से 11 फीसदी कम बारिश हुई है।

पूर्वानुमान और बारिश की स्थिति 

क्षेत्र मौसम विभाग का अनुमान मॉडल एरर 1 जून – 12 अगस्त तक हुई कुल बारिश
उत्तर पश्चिमी भारत 100 % +/- 8 % 94 %
मध्य भारत 99 % +/- 8 % 93 %
दक्षिणी प्रायद्वीप 95 % +/- 8 % 101 %
पूर्वोत्तर भारत 93 % +/- 8 % 73 %
भारत 97 % +/- 4 % 89 %

स्रोत: मौसम विभाग के आंकड़ें

जाहिर है मॉडल एरर को ध्यान में रखने के बावजूद मौसम विभाग का पूर्वानुमान अब तक हुई बारिश के आंकड़े पर खरा उतरना नजर नहीं आ रहा है। हालांकि, अभी मानसून सीजन खत्म होने में करीब डेढ़ महीना बाकी है, लेकिन अब तक हुई बारिश को देखकर मानसून सामान्य तो कतई नहीं लग रहा है।

प्राइवेट एजेंसी बदल चुकी पूर्वानुमान

यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि पूर्वानुमान सही न निकलने पर मौसम विभाग या इसके अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराना कहां तक जायज है। मौसम की जानकारी देने वाली प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट ने साल के शुरू में मानसून सामान्य रहने का पूर्वानुमान लगाया था, लेकिन एक अगस्त को इसे संशोधित करते हुए 92 फीसदी बारिश का अनुमान जारी किया है।

लेकिन ऐसा करने के बजाय मौसम विभाग सामान्य मानसून और अच्छी बारिश के दावों पर अडिग रहा।

मौसम हर हाल में सामान्य  

30 मई को मौसम विभाग की ओर जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 50 साल की औसत बारिश के मुकाबले मानसून में 96-104 फीसदी बारिश को “सामान्य” माना जाएगा। इस तरह 8 फीसदी की गुंजाइश सामान्य मानसून की परिभाषा में निहित है। इसके अलावा 4 से 9 फीसदी का मॉडल मार्जिन मौसम विभाग अपने पूर्वानुमान में रखता ही है। बारिश कितनी भी कम क्यों न हो, मौसम विभाग अपनी तरफ से सूखा घोषित नहीं करता। मौसम को सामान्य बनाए रखने का यह सरकारी तरीका है।

“सामान्य” बारिश के विस्तृत दायरे के चलते गुजरत संभाग में जहां औसत से 19 फीसदी कम बारिश हुई है, उसे भी सामान्य की श्रेणी में रखा गया है। दूसरी तरफ, कोकण-गोवा में जहां औसत से 9 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है वह भी सामान्य है। जब तक सामान्य से 19 फीसदी से ज्यादा से कम बारिश न हो, मौसम विभाग उसे सामान्य ही मानता है। इस तरह  मौसम की मार के बावजूद देश के बहुत से इलाके सामान्य बने रहते हैं। या यूं कहें कि सरकारी सिस्टम मौसम को सामान्य बनाए रखता है।

कम और अत्यधिक बारिश नजरअंदाज 

आधेे मानसून सीजन के बाद 3 अगस्त को मौसम विभाग ने बाकी दो महीनों (अगस्त, सितंबर) का पूर्वानुमान जारी किया। कायदे से तभी पूरी तस्वीर स्पष्ट करते हुए बारिश की सही स्थिति बताई जाती।

लेकिन मौसम विभाग का कहना था, “जुलाई के आखिर तक बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर को छोड़कर देश के सभी हिस्सों में वर्षा का वितरण बहुत अच्छा रहा है। मानसून के बाकी दिनों में भी वर्षा के लगातार होने की संभावना है जो कृषि संबंधी कार्यों के लिए अनुकूल रहेगी।”

यह बताते हुए मौसम विभाग सौराष्ट्र, रायलसीमा और मराठवाडा को पूरी तरह नजरअंदाज कर गया, जहां एक अगस्त तक औसत से क्रमश: 18, 41 और 10 फीसदी कम बारिश हुई है। महाराष्ट्र के 10 और गुजरात के 17 जिलों पर सूखे का संकट मंडरा रहा है।

गुजरात के कई जिलों पर सूखे का संकट

 

रेंज और मार्जिन का खेल

3 अगस्त को मौसम विभाग ने अगस्त-सितंबर में 95 फीसदी बारिश की संभावना जताई है। लेकिन मॉडल मार्जिन 4 फीसदी से बढ़ाकर 8 फीसदी कर दिया। जबकि सामान्य समझ की बात है कि नजदीकी समय का पूर्वानुमान ज्यादा सटीक होना चाहिए।

इस 8 फीसदी मॉडल मार्जिन का कमाल है कि अगस्त-सिंतबर में अगर 87-103 फीसदी के बीच बारिश होती है, तब भी मौसम विभाग का अनुमान सही ही कहलाएगा। पूर्वानुमान गलत न साबित हो जाए, इसके लिए एक-दो नहीं कुल 16 फीसदी की गुंजाइश रखी गई है। किसी भी तरह बस मौसम सामान्य नजर आए!

इस बीच, एक बड़ा बदलाव और हुआ। सामान्य बारिश की रेंज को 96-104 फीसदी से बढ़ाकर 94-106 फीसदी कर दिया गया। दोनों तरफ दो-दो फीसदी का इजाफा। पहले 95 फीसदी बारिश को “सामान्य से कम” माना जाता, लेकिन अब 94 फीसदी बारिश को भी “सामान्य” माना जाएगा। मौसम को सुहावना और सामान्य बनाए रखने का यह भी एक तरीका है।

30 मई को मानसून में सामान्य बारिश की रेंज 

3 अगस्त को मानसून में सामान्य बारिश की रेंज 

स्पष्ट है कि सामान्य ही नहीं बल्कि सामान्य से कम और अधिक बारिश के मापदंड भी दो महीने के अंदर बदले जा  चुके हैं।

इस बाबत पूछे जाने पर नई दिल्ली स्थित मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक जानकारी न होने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि मानसून का यह अनुमान मौसम विभाग का पुणे केंद्र जारी करता है। इसलिए उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। पूर्वानुमान कितना सही या गलत निकला, इसका आकलन मानसून सीजन के बाद किया जाता है, इसलिए इस बारे में फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगा।

उधर,  स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के प्रमुख और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी का कहना है कि इस किसानों ने सामान्य मानसून की उम्मीद में खूब बुवाई की। खाद, बीज भी खूब खरीदा। इस गलत अनुमान से होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा? मौसम विभाग की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

लेकिन मौसम विभाग ने क्या किया? सामान्य बारिश की रेंज बढ़ा दी, एरर मार्जिन बढ़ा दिया और कम बारिश वाले इलाकों को खास तवज्जो नहीं दी। मौसम विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि सामान्य मानसून का मतलब यह नहीं है कि हर इलाके में और हर दिन सामान्य बारिश होगी। पूर्वानुमान की समीक्षा मानसून सीजन के बाद की जाएगी।

मौसम विभाग के इस हाल पर अदम गोंडवी की यह बात याद आती है

तुम्हारी फाइलों में गांंव का मौसम गुलाबी है 
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है